‘ईश्वर है या नहीं?’ की बहस में हो सकता है हमारी धारणा न बदली हो। हो सकता है कि तर्कों की बजाय अनुभूति से हमारी धारणा पर असर पड़ता हो लेकिन मुफ्ती साहब और जावेद साहब की बहस में प्रतिद्वंद्विता के स्तर पर नदवी साहब साहब बीस दिखे। वह एक सवाल पर टिके रहे। बताया कि खुदा है लेकिन वह पैरानॉर्मल बात है। उसको साबित नहीं कर सकते क्योंकि साबित करना दुनियावी सरहद का काम है। खुदा सर्वव्यापक है। नैसर्गिक स्थापना है। उसको सिद्ध नहीं किया जा सकता।
लेकिन नदवी साहब यह भी कहते हैं कि उसने यानी खुदा ने मनुष्यों को फ्री विल दिया है। उससे वो जो चाहे कर सकते हैं। जैसे किसी परीक्षा में सवाल बनाने वाला चार ऑप्शन देता है। ग़लत या सही चुनने की ज़िम्मेदारी परीक्षार्थी पर है। उसके पास फ्री विल है। जैसे एग्जामिनर सब देखता है। परीक्षार्थी को ग़लत विकल्प चुनते भी देखता है लेकिन वह उसे ऐसा करने से रोक नहीं सकता। विकल्प चुनना पूरी तरह से परीक्षार्थी की ज़िम्मेदारी है।
यह जावेद अख़्तर के उस सवाल का जवाब था जिसमें वह कहते हैं कि ग़ज़ा में लाखों बच्चे मर रहे हैं और वो खुदा बैठा देख रहा है। नदवी साहब के कहने का लब्बोलुआब था कि सृष्टि फ्री विल के आधार पर अच्छे और बुरे कर्मों का संतुलन है। ईविल अगर अपनी फ्री विल से बच्चों की हत्याएं कर रहा है तो Goodwill का कर्तव्य है कि वो अपनी फ्री विल से उनके संरक्षण का काम करें। संतुलन ऐसे बनेगा। इस सिद्धांत से यह तो साबित होता ही है कि दुनिया में ईविल सदाचारी लोगों से ज़्यादा संगठित है।
जावेद साहब इसका कुछ अकाट्य जवाब न दे सके। वह यही साबित करते रहे कि खुदा यह नरसंहार देख रहा है तो कैसा खुदा है। यह खुदा के अनस्तित्व से ज़्यादा उसे ईविल सिद्ध करने का तर्क़ लगता है। यानी यह साबित ही कर रहा है कि भले बुरे रूप में है लेकिन खुदा है।
अगर आप खुदा के अस्तित्व को मान ले रहे तो मुफ्ती ये तो मनवा ही लेंगे कि वो बुरा नहीं है अच्छा ही है।
सवाल मुफ्ती साहब से ये होना चाहिए था कि खुदा है तो दिखाओ? कहाँ है? उसके लक्षण बताओ। जिससे महसूस करें कि वो है? उसके होने का अर्थ क्या है? जब आप बहस में बैठे हैं तो सिर्फ पैरनॉर्मल कहकर या एक अनुत्तरित सा लगने वाला सवाल छोड़कर कि टापू पर गेंद किसने रखी, खुदा को साबित नहीं कर सकते.
सवाल मुफ्ती साहब से ये भी होना चाहिए था कि खुदा क्या सिर्फ मनुष्यों के लिए है? क्या वह सिर्फ मनुष्यों के ईविल या गुडनेस को ऑब्जर्व, मॉनिटर या दर्ज कर रहा है? पृथ्वी के अन्य जंतुओं के लिए उसकी क्या व्यवस्था है?
नदवी साहब कहते हैं विज्ञान यह पता लगता है कि यह चीज अभी है। या यह चीज ऐसे होता है। वह प्रोसेस का ज्ञान करना है जिसे अविष्कार कहते हैं। वह वर्तमान की संरचना को समझता है लेकिन उसके सृजन को या उसके सृजक को नहीं जानता। जैसे ‘गैप ऑफ़ गॉड’ का उदाहरण देखें। कार चलती है। तर्क कहेगा इंजन से चलती है। लेकिन सही जवाब है कि कार है इसलिए चलती है। और कार है क्योंकि कोई है जो कार बनाता है। वह है तो इंजन है। इंजन है तो कार चलती है। वैसे ही। प्रकृति के रहस्यों के पीछे कारण है और इन सबके पीछे सार्वकालिक कारण कोई खुदा ही है।
विज्ञान ने यह भी पता लगाया कि इंसान पहले बंदर था। उद्विकास का नतीजा आज का मनुष्य है। तो क्या उन अधपके मनुष्यों में भी खुदा फ्री विल का संचार करता रहा था? तब की बात छोड़ दें. मनुष्य की तरह खुदा के बनाए बंदरों, शेर, चीतों पर भी वही फ्री विल लागू होगा? जहाँ तक मेरी समझ है फ्री विल विवेक के अधीन होना चाहिए। क्या जिन प्राणियों में विवेक नहीं है वह भी इस फ्री विल सिद्धांत के अनुसार चलते हैं? सिर्फ मनुष्यों को लेकर खुदा इतना उदार क्यों हैं. बाकी क्रिएशन्स से पक्षपात क्यों करता है? जैसे, किसी शेर या चीते का किसी बच्चे को खा जाने पर खुदा के निजाम का इंसाफ क्या कहता है? क्या शेर चीतों को भी सजा मिलेगी? उनके पास तो एक फ्री विल है. भूख का शमन करना। चाहे जैसे भी हो।
यहाँ तो जावेद अख़्तर का तर्क ठीक लगता है। शेर चीतों द्वारा की गई हत्याओं का कोई इंसाफ़ नहीं है।
फिर एक और सवाल। प्रार्थना का अर्थ क्या है? क्या प्रार्थना से फ्री विल पर प्रभाव पड़ता है? किन प्रावधानों के आधार पर खुदा फ्री विल के उत्पादों में दखल देता होगा? जैसे अगर किसी की विल प्रधानमंत्री बनने की है। वह प्रार्थना करे तो क्या उसकी ये इच्छा आसानी से पूरी होगी? क्या खुदा इसमें सहयोग करेगा? अगर नहीं करेगा तो प्रार्थना क्यों की जाये? अगर करेगा तो फिर यह फेयर गेम कहाँ बचा? फिर यूनिफार्म रूल कहाँ रहा जिससे खुदा की निष्पक्ष निगरानी कयामत के दिन या जहन्नुम या स्वर्ग जैसी ग़ैर दुनियावी मंजिल का रास्ता खोलती है?
नदवी साहब बार बार ये भी कहते हैं कि खुदा अच्छे समाज की रचना के सिद्धांत बताता है। वह भाषा क्या है? जिससे खुदा ये बताता है? वह स्वरूप क्या है जो खुदा का है। बताने या भाषा से संचार मनुष्यों की खोज है। यह हमेशा से नहीं था। भाषा का इतिहास, सामाजिक जीवन का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। क्या हमेशा से मौजूद खुदा के पास ये भाषा और समाज की संरचना का ढाँचा पहले से था। अगर था तो यह सिर्फ़ मनुष्यों को मिला? किसी मत्स्य परिवार या छिपकली परिवार या सांप परिवार के जंतुओं को क्यों नहीं मिला?
क्या हम इंसान हैं और ‘ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं’ पर डिबेट करने के लिए बौद्धिक क्षमता रखते हैं इसलिए ही तो हमारे खुदा या ईश्वर मनुष्याकार नहीं है। उसके व्यवहार मनुष्यों से हैं? सिद्धांत देने की उसकी प्रवृत्ति, इंसाफ़ करने की उसकी अथॉरिटी या एग्ज़ामिनर की तरह अहस्तक्षेपक विवेकशील द्रष्टा होने की उसकी स्थिति मनुष्यों से मिलती जुलती सी है।
अगर खुदा है तो वह कैसा होगा? अगर वो यह सब नहीं करता है और सब होने देता है सार्वभौमिक नियमों के हिसाब से, तो यह तो नास्तिकता की अवधारणा के करीब है कि प्रकृति है। सर्वव्याप्त है। उसके नियम हैं। उस नियम से सब कुछ चलता है। जो अनियमित होता है प्रकृति आपदाओं के ज़रिए या कैसे भी उसे नियमित कर देती है। फिर खुदा और प्रकृति एकाकार हो जाते हैं। नास्तिकता आस्तिकता एक लाइन पर खड़ी हो जाती है।
मनुष्य मन की असीम जिज्ञासा के एक छोर पर बेरिकेडिंग लगाकर उसी काल्पनिक अस्तित्व को खुदा बता देना सिर्फ बौद्धिक वितण्डा या तार्किक चतुराई ही लगती है। खुदा का होना साबित नहीं होता। ये इंसान की वही आदिम प्रवृत्ति का परिष्कृत और विस्तारित संस्करण लगता है जिसमें उसकी बुद्धि, उसकी कल्पना या उसकी सोच जहाँ खत्म हो जाती थी, वहीं से भगवान खुदा कुलदेवी कुलदेवता का अस्तित्व शुरू हो जाता था। क्या खुदा या भगवान मनुष्य की कल्पनाशक्ति की सीमा का दूसरा नाम ही है?
इसलिए तर्कों में जावेद अख्तर से जीतते लगते हुए भी मुफ्ती साहब उनकी कही एक बात की अर्थगत निःसीमा में विराट आकाश की तरह ही सही लेकिन सीमित हो जाते हैं। वो बात है कि वह सृष्टि की अनंत यात्रा को एक खुदा तक ले जाकर रोक देते हैं।
इसका जवाब मुफ्ती ये कहकर देते हैं कि खुदा समय से परे है। समय नहीं था तब भी वह था। क्या था इसका जवाब नहीं मिलता। मिलता है तो ये कि उसका वर्णन दुनियावी संकेतों से नहीं किया जा सकता, लेकिन यह तर्क गले नहीं उतरता। यह ऐसे लगता है जैसे भूगोल और उर्दू के विद्यार्थी में बहस हो और भूगोल वाला कहे कि उसके सिद्धांत का सत्यापन गणित की कल्पना में संभव है।
इससे अच्छा तो ब्लैक होल वाला तर्क है जो कम से कम मनुष्यों के समझ तो आ सकता है कि वह सब कुछ को एक दिन अपने गुरुत्व के आकर्षण में खींच लेगा और किसी दिन उसे ही विस्तृत करके नया यूनिवर्स या मेटावर्स रच देगा और यह क्रिया बार बार दोहरायी जाती रहेगी।
या ये कि ईश्वर एक अज्ञेय संकल्पना है। उसके बारे में जितना जानने की कोशिश की जाएगी, लगेगा उतना ही कम जाना।
(दी लल्लनटॉप पर जावेद अख्तर और मुफ्ती की बहस पर आधारित)