Thursday, 12 September 2019

प्रेम में नाराजगी की ज़रूरत

तस्वीरः पीयूष कुंवर कौशिक

नाराजगी हमेशा नकारात्मक नहीं है। नाराजगी एक तरह की अभिव्यक्ति भी है। एक संदेश है या एक तरीका है जिससे आप अपनी वे बातें कह सकते हैं जो सामाजिक संबधों के अनुच्छेदों में सैद्धांतिक तौर पर शामिल हैं भी और नहीं भी। ऐसी बातें जिनकी सामाजिक मान्यता पर कई सवाल भौहें चढ़ाए खड़े होते हैं। आप नाराजगी के जरिए अपने उन संदेशों को संप्रेषित करते हैं, जो सिद्धांतों में सही लगते हैं लेकिन व्यवहारिकता में जिन्हें कहने में संकोच है।

प्रेम में नाराजगी
प्रेम में नाराजगी एक अदा है। एक अदाकारी है। नाराज होना और फिर नाराजगी खत्म करने के जतन से प्रेम पुष्ट होने का दावा प्रेम मर्मज्ञों की ओर से किया जाता रहा है। केवल स्त्री-पुरुष प्रेम में नहीं बल्कि किसी भी तरह के प्रेम-स्नेह में नाराजगी की अपनी जरूरत है। नाराजगी की सबसे पहली घोषणा ही यही है कि आपसे प्रेम है। आपसे प्रेम है इसलिए नाराज हैं। दोस्ती की या रिश्तों की नाक में भी कभी-कभी खर-पतवार जाने लगते हैं। नाराजगी एक जोरदार छींक है जो झटक कर ऐसे पतवारों को बाहर कर देती है। यह रिश्तों की कड़वाहटें दूर करने में भी मदद करता है। रिश्तों को डिटॉक्सिफाइ करने वाला ग्रीन टी। कड़वा तो है, तकलीफदेह तो है लेकिन अगर पी ले गए, संभाल लिया सही से तो संबंधों की सेहत भी दुरुस्त होगी।

नाराजगी का जवाब
लेकिन इन सबकी कुछ शर्तें हैं। किसी की नाराजगी को ठीक तरीके से बरतने का हुनर आना चाहिए। यहां अगर लापरवाही हुई या अहं बीच में आया तो वह सब कुछ खत्म हो सकता है जिसे बड़ी आसानी से बचाया जा सकता था। पहली शर्त ये कि नाराजगी का जवाब कभी नाराजगी नहीं हो सकता। खासकर उसके लिए जिसे आप चाहते हों। जिससे प्रेम करते हैं। प्रेम में प्रतिकार तो होता ही नहीं है। दूसरी शर्त यह कि किसी की नाराजगी को ज्यादा देर तक के लिए छोड़ नहीं सकते। इससे उस पर दुनिया भर की गलतफहमियों, आशंकाओं और कड़वाहट के कीटों का डेरा जमने लगता है। यह आपके रिश्ते को बीमार बना सकता है, जिससे उसकी मौत भी हो सकती है। और इन सबसे ज़रूरी शर्त यह कि नाराजगी को स्वीकार करें। उसकी उपेक्षा कम से कम कभी न करें। नाराजगी को बहलाकर टाल देना रिश्तों के लिए सबसे घातक हो सकता है।

इक्विलिब्रियम के लिए नाराजगी
दो मन कभी एक जैसे नहीं हो सकते। मनांतर को समतल करने की प्रक्रिया ही नाराजगी है। हम एक दूसरे के साथ इक्विलिब्रियम में आना चाहते हैं इसलिए नाराजगी होती है। इसका उद्देश्य निःसंदेह पवित्र है इसलिए इसका सम्मान भी होना चाहिए। नाराजगी के सम्मान की जरूरत मैं सबसे ज्यादा समझता हूं। मेरे साथ इसका बुरा अनुभव रहा है। मुझे हमेशा से लगता है कि मेरी नाराजगी का किसी ने सम्मान नहीं किया। इसका कारण यह भी हो सकता है कि मैं कई बार अकारण (लोगों की नजर में) नाराज हो जाता हूं। कई बार मैं अपने प्रिय लोगों में अपनी कीमत महसूस करने के लिए भी नाराज हो गया हूं। ऐसे वक़्त में जब नाराजगी का सम्मान नहीं होता तो मन में घृणा भी भरने लगती है।

नाराजगी का सम्मान
अपनी गलती मान लेना कोई बड़ा अपराध नहीं है। मैंने अपने जीवन में हमेशा कोशिश की है कि अगर कोई मुझसे नाराज है तो उसकी नाराजगी का सम्मान करूं। मैंने किया भी है। हालांकि, नाराजगी जाहिर करने वाले भी कम ही रहे हैं लेकिन जितने भी रहे हैं मैंने कोशिश की है कि उनकी नाराजगी को सही तरीके से दूर किया जाए। मतभेद भुला दें उस वक्त पर। बीच में अभिमान न लाएं। हो सकता है मैं हमेशा से ऐसे न रहा होऊं लेकिन मेरे साथ कई बार ऐसी घटनाएं घटीं कि मुझे यह चीज सबसे जरूरी लगने लगी।

आपबीती
मां से नाराज होता तो जिद कर लेता कि जब तक उन्हें यह नहीं लगेगा कि उनकी गलती थी, मेरी नहीं, तब तक मैं उनसे बात नहीं करूंगा। कई बार मां को पता ही नहीं होता कि मैं उनसे किस बात पर नाराज हूं। मेरी भी जिद कि बताऊंगा नहीं। ज्यादातर बार तीन-चार दिन में मामला सामान्य हो जाता और बातचीत की प्रक्रिया बहाल हो जाती। इस बीच मां अगर मनाने की कोशिश नहीं करतीं तो गुस्सा बढ़ता जाता था। कई बार खाना-पीना छोड़ दिया। मां छटपटाहट के स्तर पर परेशान हो जातीं लेकिन मैं नहीं बताता कि बात क्या है? किसलिए नाराज हैं?

स्थायी रिक्ति
ऐसे ही किसी मामले पर नाराजगी ऐसी बढ़ी कि मैंने अपने जीवन का सबसे बड़ा नुकसान कर लिया। मां से नाराज होना अपने आप में एक बड़ी विपदा है। मैंने तो इस नाराजगी को स्थायी बना दिया। सिर्फ अपनी जिद और अपने गुस्से की वजह से। विश्लेषण हो तो शायद मेरी ही गलती सामने आए लेकिन यह प्रवृत्ति रही और अब भी है। यह मेरा निजी नुकसान है। भावनात्मक स्तर पर आज भी एक रिक्ति है, जिसे अब मैं चाहते हुए भी भरना नहीं चाहता। शायद यह नाराजगी अब स्थायी हो गई है।

अप्रभावना का अभिनय खतरनाक
खैर, ऐसे अनेक मामले हैं परिवार में ही। बाहर भी। कई मित्रों से जो बातचीत छूटी वह आज तक बहाल नहीं हो पाई। इनमें से कई घनिष्ठ दोस्त रहे। भावनात्मक आशावाद का यह चरित्र मुझे लगातार तबाह करता रहा है। खैर, इन सब अनुभवों में मैं जो सबसे जरूरी चीज महसूस करता हूं वह यही है कि जो आपसे प्यार करता है उसकी नाराजगी का सम्मान कीजिए। बहुत सी समस्याएं बस इसी से सुलझ जाती हैं कि आपने उसकी नाराजगी को संज्ञान में लिया। अपने करीबी की नाराजगी पर अगर आप अप्रभावित होने का प्रदर्शन कर रहे हैं तो यह युद्ध के ऐलान जैसा है। यह उस नाराजगी के अपमान जैसा है जिसकी जड़ में आपसे अथाह प्रेम है और आपसे अनेक आशाएं हैं।

Thursday, 5 September 2019

असहिष्णु 'गुरुविहीन' लोग बनेंगे 'विश्वगुरु'?

दो साल पहले 5 सितंबर को गौरी लंकेश की हत्या कर दी गई थी। अच्छा है कि जीवन भर हमें गुरु नहीं मिलता। हम इतने असहिष्णु हैं कि गुरु मिल जाए तो दस दिन के भीतर हम उसकी हत्या कर देंगे। हम लंकेश को सार्वभौमिक और आदर्श गुरु की तरह स्थापित करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं बल्कि भारतीय समाज की मानस-काया पर गुरु के शरीर से विकिरित होने वाले प्रकाश के ताप को सहन कर पाने की क्षमता का आकलन कर रहे हैं। लंकेश ने किसी को विचारधारात्मक मुक्ति के लिए नहीं उकसाया लेकिन गुरु तो आपको विचारधारात्मक 'मृत्यु' के लिए प्रेरित करता है।

गुरु मृत्यु है
शास्त्रों में कहा है कि 'आचार्यो मृत्यु'। गुरु मृत्यु है। गुरु सबसे पहले आपको 'मृत्यु' देता है। सद्गुरु के पास जाना मृत्यु है और सद्गुरु के पास से जाना निर्वाण। गुरु पहले हमारी विचारधाराएं तोड़ता है, हमारा सारा संसार विनष्ट कर देता है और फिर निर्माण के फूल खिलाता है। नवनिर्माण के फूल। जो यह सहन कर ले, गुरु उसके ही नसीब में है। आत्मिक पर तौर पर हमारी गहरी नींद को देखकर नहीं लगता कि हम ऐसे किसी गुरु के सामीप्य को लेकर जरा भी तैयार हैं। हम उसे भी गौरी लंकेश की तरह मार देंगे। उसकी गैलिलियो की तरह, सुकरात की तरह हत्या कर देंगे। 

यह सच है कि ऐसे में हम गुरू की हत्या नहीं करेंगे तो गुरु हमारी हत्या कर देगा। इस खेल में एक का तो मरना तय है लेकिन शिष्य के मरने में सृजन है। गतिशीलता है। गुरु के मरने में अंधकार के द्वार का खुलना है। अज्ञात के रहस्य बने रहने की शाश्वतता पर मुहर है। नींद की अमरता की घोषणा है, इसलिए दीप बुझाने से मिट्टी का संगठन तोड़कर और उसे पुनर्गठित कर दीया बनाने की प्रक्रिया ज्यादा पावन और संसार के अनुकूल है। इसलिए गुरू की हत्या नहीं, शिष्य की मृत्यु सही है, अनिवार्य है।

हत्या की आवश्यकता क्यों?
लेकिन, अगर सवाल उठे कि गुरु को आखिर इस 'हत्या' की आवश्यकता क्यों है? उसे ज्ञान देने के लिए अपने शिष्य को 'मृत्यु' क्यों देनी है? तो इसका उत्तर भी जागृति की हमारी लालसा है। जागरण के लिए नींद का मरना जरूरी है। नींद के सपनों का मरना जरूरी है। नींद में हमारा एक संसार है, उसका विध्वंस जरूरी है। हमारे संसार में मर जाना यही तो है।

हम गुरु के पास जागृति के लिए जाते हैं। जगत की निद्रा से जागरण की ओर, प्रकाश की ओर जाने के लिए। इसका अर्थ यह है कि इससे पूर्व हम नींद में थे। स्वप्न में थे। ख्वाब में कोई भी चीज यथार्थ नहीं है। सब कल्पना है। सब अयथार्थ है। नींद में आपकी जो भी विचारधारा थी, आपका जो भी स्वप्न था, आपका जो भी संसार था, सब काल्पनिक था। अयथार्थ था। झूठा था। गुरु आपके इस स्वरुप की मानस 'हत्या' करता है। हत्या अगर नकारात्मक लगता हो तो मान लें कि गुरु आपको ज्ञान से पहले एक प्रकार की मृत्यु देता है। एक काल्पनिक और अयथार्थ संसार से मुक्ति। इसके बाद ज्ञान की, जागरण की और प्रकाश की आधारशिला रखी जाती है।

गुरु विध्वंसक है
गुरु विध्वंसक है। हमारी रूढ़िगत परम्पराएं और उधार की जीवनशैली तोड़कर ही गुरु हमारे अंदर मौलिकता पैदा करने की कोशिश करता है। हमने जो जीवनशैली, परंपराएं अपने पूर्वजों से उधार ली होती हैं, गुरू उस पर भी प्रहार करता है। उन्हें विनष्ट करता है। हमें अपने भीतर इतने विध्वंस अगर स्वीकार्य हों, तभी हम गुरु के पास रुकने की हिम्मत कर सकते हैं। हमें इस 'मृत्यु' के लिए तैयार होकर ही गुरु के समीप जाना चाहिए।

गुरु के यहां जो सबसे पहले तोड़ा जाएगा वह मंदिर होगा। मठ होगा। मस्जिद और गिरजाघर होगा। आपके धार्मिक पाखण्ड सबसे पहले तोड़े जाएंगे। मंदिर-मस्जिद बनवाने के लिए मुक़दमे लड़ रहे हम लोग ऐसे गुरु को बर्दाश्त कर पाएंगे क्या? हम उसकी हत्या ही कर देंगे और समय-समय पर हम इस चीज को सिद्ध ही कर रहे हैं।

ईश्वर सुलभ पर गुरु नहीं
गुरु जागरण है। हम आराम तलब लोगों के लिए जागरण ठीक बात नहीं। हम सोए हुए ही सुख महसूस करने वाले हैं। गुरु हमें जगा देगा और जगा देने वाले हमें प्रिय कैसे हो सकेंगे। वह तो दुश्मन ही हैं। शास्त्रों में इसीलिए गुरु का मिलना कठिन बताया गया होगा। कबीर इसीलिए गुरु की महत्ता पर अपने सबसे अधिक दोहे रचे होंगे। गुरु तक पहुंचने का मार्ग कठिन तो है। इसलिए गुरू का सबको मिल पाना सहज नहीं है। इसलिए, गुरु का स्थान शायद ईश्वर से भी ऊपर होगा क्योंकि ईश्वर का मिल जाना भी सुलभ हो सकता है लेकिन गुरु का मिल पाना नहीं।

गुरु मांग का परिणाम नहीं
गुरु मांग का परिणाम नहीं है। हो सकता है कि आप गुरु के लिए जिस समस्या का समाधान कराने जाएं उसका हल न मिले। क्योंकि, गुरु मांग का परिणाम है। गुरु वाणिज्यिक प्रत्युत्पन्न नहीं है। जैसे- हमें लंबी यात्राओं के लिए यंत्र की आवश्यकता हुई तो प्लेन, ट्रेन और कार जैसी चीजें बनीं। संपर्क के संसाधनों की जरूरत लगी तो फोन, इंटरनेट जैसी चीजों का आविष्कार हुआ। वैसे ही, भावनात्मक सांत्वना की मांग से गुरु तो मिल जाएंगे लेकिन सद्गुरु पैदा नहीं होंगे। मांग-आपूर्ति के सूत्र से पैदा होने वाले गुरु असंख्य हैं। वह आपके हिसाब से चलेंगे। जैसे बाजार उपभोक्ताओं के हिसाब से चलता है। अब तो वह उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं को भी पैदा करने लगा है। ऐसे ही व्यापारिक गुरु भी पहले आपके लिए कष्ट तैयार करेंगे फिर उसके इलाज के लिए दुकानें सजा लेंगे। यह झूठे गुरु हैं।

गुरुविहीन लोग बनेंगे विश्वगुरु?
ऐसे गुरु आपकी अनुभूति का शोषण करेंगे। वे आपको मूल रूप में जिंदा रखेंगे। वे बीज को जमीन के अंदर ही सो जाने को प्रेरित करेंगे और उसके ही उपाय में लगे रहेंगे जबकि सद्गुरु तो आपको सबसे पहले भीतर ही तोड़ देगा। आपके मूल स्वरूप को मार देगा जिसमें आप निद्रित अवस्था में थे। उसके बाद आप स्वतः ही उगने लगेंगे। पौध बनेंगे। फिर वृक्ष बनेंगे। सद्गुरु आपसे 'सर्वधर्मान् परित्यज्य' के लिए कहेंगे। अगर आप तैयार होंगे, तो आप कबीर हो जाएंगे। फिर आपके मन में भी सदैव एक 'हौंस' रहेगी कि 'क्या ले गुरु संतोषिए।' तब आप 'सात समंद की मसि' और 'सब धरती को कागज' करने के बाद भी 'गुरु गुण' नहीं कह पाएंगे। नहीं तो, आप गुरु की हत्या कर देंगे। प्रतिकूलता को बर्दाश्त कर पाने की हमारी यही आदत हमें गुरुविहीन कर रही है और हम विश्वगुरु बनने के सपने देख रहे हैं। 

नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में

Monday, 2 September 2019

मोक्ष पर निरर्थक विचार-द्वंद्व

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हुसड़िया चौराहे से ग्वारी चौराहे के बीच रास्ते में एक अपरिचित चाचाजी ने सुकरात के बारे में पूछते हुए रोक लिया। वह साइकल-पथ के किनारे पर लोहे की एक बेंच पर बैठे थे। बोले, सुकरात को अंग्रेजी में क्या कहते हैं। मैंने बताया तो बोले, प्लेटो को अरबी में अफलातून कहते हैं। दार्शनिक बातों की शुरुआत समझकर न चाहते हुए भी उनके बगल में बेंच पर बैठ गया। जैसे ही मैं बैठा, सुकरात-प्लेटो और अरस्तू में सम्बन्ध समझाकर वह चुप हो गए। यह चुप्पी जैसे विषयान्तर को स्पष्ट करने के लिए ज़रूरी ही थी क्योंकि इस विराम के बाद हमारी बातचीत का (लगभग प्रवचन का) ट्रैक बदल गया।

अपरिचित चाचाजी ने अचानक पूछा कि मोक्ष जानते हो? मुझे लगा कि बात सुकरात से शुरू हुई है तो मोक्ष की ज़रूर दूसरी कुछ व्याख्या मिलेगी इसलिए मैंने इस बारे में अल्पज्ञान का संकेत करते हुए ससंदेह कहा कि मेरी जानकारी में तो इसका मतलब है मुक्ति। आध्यात्मिक व्याख्या में जाएं तो 84 लाख योनियों में आवागमन से मुक्ति। सम्पूर्ण स्वतंत्रता। चाचाजी चुप हो गए। मैं प्रतीक्षा करने लगा कि मेरी बात में अब संशोधन किया जाएगा। सन्दर्भ पुराणों से हटाए जाएंगे और कुछ दार्शनिकता या वैज्ञानिकता की बात की जाएगी। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। चाचाजी तो मेरी बात पर सहमत हो गए। बोले, सही है। यही मतलब है। इतना ही नहीं, प्रवचन आगे बढ़ाते हुए बोले कि मनुष्य के जीवन का एक ही उद्देश्य हो। मोक्ष। बाकी सब कुछ विनाशी है। मोक्ष ही असल पुरुषार्थ है जो सही मायने में अविनाशी है। बाकी सभी पुरुषार्थों (धर्म-अर्थ-काम) के फल नाशवान हैं।

वह मुझे समझाने लगे कि उम्र के एक छोर पर मैं खड़ा हूँ और एक छोर पर तुम हो। मैं अनुभव से कहता हूँ कि खाली वक़्त पर गीताप्रेस की गीता पढ़ा करो। जीवन के बहुत सारे सवालों का जवाब मिल जाएगा। फिर उन्होंने आत्मा की अनश्वरता का वही सिद्धांत समझाया जिसे बचपन से हज़ारों बार सुन चुके हैं। बोले कि मानव होना सौभाग्य की बात है इसलिए इसका महत्त्व समझना और जिस भी ईश्वर को मानते हो उसका भजन करना।

असहमतियां हज़ार थीं उनसे। तकरीबन हर कदम पर। इससे पहले भी एक बार उनसे मुलाक़ात हुई थी। तब भी उनकी बातें प्रगतिशील आधुनिकता के आवरण में रूढ़िवादी पुरातनता का विस्तृत विवरण ही लगी थीं। खैर, यह उनके निजी विचार और विमर्श थे जो निश्चित ही उपदेशात्मक उद्देश्यों के अधीन ही विकसित हुए थे। बुज़ुर्ग हिंदुओं में यह प्रवृत्ति है। अपने अनुभव से यथार्थ बताने की बजाय वह आदर्शवादी हो जाते हैं। धर्म-अध्यात्म की शरण में न सिर्फ जाते हैं बल्कि हर किसी को वहीँ जाने की सलाह देने लगते हैं।

उनसे बातचीत के दौरान मैं उनकी अवस्था विशेष के लोगों का मनोविज्ञान सोच रहा था। नौकरी कर चुकने के बाद, रिटायर हो जाने के बाद जब वह अपना अब तक का हासिल देखते होंगे, जब देखते होंगे कि सामाजिक भागदौड़ का हिस्सा बनकर अंत में क्या मिला? तो ज़रूर एक नैराश्य की छाया उनके दिलोदिमाग पर तारी हो जाती होगी। उन्हें लगता होगा कि अब तक तो कुछ मिला नहीं, अब क्या किया जाए कि जीवन तर जाए। आध्यामिकता ऐसे में उन्हें अंतिम विकल्प नज़र आता होगा। समय चूक जाने के बाद भी सम्भलने का उपाय यहीं मिलता है। हां, उसकी सार्थकता सदैव से संदिग्ध है।

एक सवाल और उठाकर आता होगा। आखिर, यह नैराश्य क्यों है। ऐसा क्या तय करके चले थे कि अभाव महसूस हो। खालीपन महसूस हो। ऐसा क्या करना था कि कर लेते तो संपूर्णता का बोध होता। मोक्ष की दावेदारी होती। क्या बहुत नाम कमा लेना। पैसे कमा लेना। या फिर भगवन्नाम की सांख्यिकी का पहाड़ खड़ा कर देना। किससे मोचन हो? कैसे मोक्ष हो? मनोविज्ञान में भी शायद इसका स्पष्ट जवाब नहीं है। वहां भी कहा गया कि अपने मन से जीना। अपने दिल से जीना। जो ऐसे जिया, उनमे से भी किसी ने दावा नहीं किया कि वह अंतिम में अपने आपको सम्पूर्ण अनुभव करते थे।

आध्यात्म केवल एक उपाय सुझाता है। धर्मगुरुओं के हवाले से वह यह है कि भगवान के नाम का जाप करते जाओ। केवल वह नाम ही मोक्ष दिला सकता है। तुलसीदास लिख गए। कलियुग केवल नाम आधारा। हालांकि, यह बड़ा कुतार्किक लगता है। किसी का ऋणी होना, किसी के प्रति भक्ति रखना एक बात है। केवल उसका नाम जपना दूसरी बात। नाम जपने के लिए जन्म होना मतलब आप आत्मश्लाघा के एक अजीब खेल के टूल भर हैं, जहाँ एक ईश्वर है और उसने आपको बना दिया कि आप उसका नाम जपें। मुझे हाथ-पांव-भाव-संकल्प-जिज्ञासा वाला मानव ऐसा टूल नहीं लगता। इसलिए मैं इसे मोक्ष का उपाय नहीं मानता।

अब सवाल है कि संतुष्टि फिर कैसे हो? समाधान क्या हो? जीवन की साँझ में संतोष का प्रकाश कैसे जीवित रखें? क्या करें कि चाचाजी की अवस्था में पहुंचे तो यह निराशा न हो कि तन-मन-धन में से किसी की भी सेहत पर बुरा असर पड़े। यह सोचते हैं तो लगता है कि संतुष्टि चाहिए ही क्यों? क्या संतोष ही आखिरी लक्ष्य है? संतोष के बाद क्या है? क्योंकि ब्रह्माण्ड का प्रसार तो अनंत है। इसका तो कोई चरम नहीं है। अगर चरम नहीं है इसका सिर्फ माइलस्टोन हो सकता है, पड़ाव हो सकता है, अंतिम बिंदु नहीं हो सकता। हिन्दू ग्रंथों में निरन्तर चलने को ही जीवन कहा गया है। सम्यक प्रकारेण सरति इति संसारः। निर्लक्ष्य। हर दिन नए लक्ष्य बनाते।

संतुष्टि की कोशिश में अभाव चोटिल करने लगते हैं और सैद्धांतिक तौर पर संतोष का कोई अस्तित्व ही नहीं है। जीवन और इच्छाएं एक-दूसरे के समानांतर चलती हुई रेखाएं हैं। यह अनंत पर मिलती हैं और अनंत होता ही नहीं। तो क्या करें? क्या सही है करना। संसार का उद्देश्य क्या हो। बस चलना। लगातार यात्रा। कुछ भी लक्ष्य नहीं। कोई घर नहीं।

चाचाजी बोले कि स्वर्ग पा लेना भी नाशवान उपलब्धि है। वह भी ख़त्म हो जाना है। वह बड़े व्यापक परिप्रेक्ष्य में देख रहे थे। समग्रता में। जन्म-मृत्यु के पार तक। इसलिए वह सुझा रहे थे कि मोक्ष ही अंतिम लक्ष्य हो। उसकी कोई सीमा नहीं है। अनन्त की तरह। अनंत ही अंतिम है। अनंत के आगे कुछ नहीं है। यह सोच भी सही है कि मोक्ष ही लक्ष्य हो। मोक्ष मतलब ही संतुष्टि है। संतुष्टि मतलब जीवन और इच्छाओं का एक बिंदु पर मिलना। वह बिंदु जो अनंत है। अनंत मतलब जो अस्तित्वहीन है। अंतिम मतलब कि संतोष वास्तव में कुछ नहीं है। अभाव ही जीवन को आगे बढ़ाते हैं। वेकैंसी रहना ही अभिक्रियात्मक है। अभिक्रिया नहीं है तो सब शून्य है।

निर्णय ये कि चाचाजी का कहना सर्वथा ग़लत नहीं था। उनके साधन अवैज्ञानिक, अतार्किक और अति प्रतीकात्मक थे लेकिन जीवन के उद्देश्य में मुक्ति के अंतिम लक्ष्य होने को इंकार नहीं किया जा सकता। यह संसार ही शून्य और अनंत के बीच है और ये दोनों ही लक्ष्यात्मक बिंदु वास्तव में केवल कल्पना और सिद्धांतों में हैं। यथार्थ में नहीं। सो, मोक्ष भी यथार्थ में नहीं है। केवल कल्पना में है।

Thursday, 30 May 2019

गरीब सांसद शब्द का पुनर्जीवन

सारंगी सराहना के योग्य हैं, जिन्होंने गरीब सांसद शब्द को पुनर्जीवित किया है

यह देश काल के इस पड़ाव पर भी और कितने प्रताप चंद्र सारंगी दे सकता है? सवाल है कि कमल-निशान न होने पर भी क्या साइकिल से प्रचार करने वाले और झोपड़े में रहने वाले सारंगी संसद पहुँच सकते थे? भारतीय सियासत में गरीब सांसद शब्द कब का लुप्त हो चुका था। कब सुना था यह याद नहीं। शायद न ही सुना हो लेकिन यह सुकून देता है।

हम खुश हो रहे हैं, मोहित हैं, न्यौछावर हैं, सारंगी की गरीबी पर। उनकी जनप्रियता पर फिर भी नहीं। हम द्रवित हैं कि वह सरकारी हैण्डपम्प पर भी स्नान कर लेते हैं, उनकी योग्यता पर अब भी नहीं। उन्हें किस लिहाज से 'उड़ीसा का मोदी' कहा जाता है यह जानना हमारे लिए अभी बाकी है लेकिन यह सच है कि तमाम मोदी और सारंगी हमें तब ही पसन्द आते हैं जब वह गरीब नहीं रह जाते, गरीबी के प्रतीक बन जाते हैं। जैसे अनेक वस्त्रहीन नागरिकों का यह देश अपने तिरंगीन प्रतीक को देखकर मोहित होता है।

वास्तविकता है कि सारंगी हमारे लिए विकल्प भी नहीं होते। सारंगी जैसे लोग संसद पहुँचते हैं तो इसमें उनकी निजी प्रतिभा है। हमारा कोई योगदान नहीं। अगर होता तो जनसेवा का सबसे उर्वर अवसर करोड़पतियों का गंदा खेल न बन जाता। 17 लाख की संपत्ति वाले सांसद को 5 साल में 10 करोड़ की संपत्ति का सर्वेसर्वा होते हुए देखते भी हम उसे फिर से अपना रहनुमा नहीं चुनते। तमाम सारंगी चुनाव में खड़े होते हैं और हरा दिए जाते हैं।

यह भी विडम्बना है कि हम 'गरीब सांसद' शब्द से परेशान नहीं होते। हमें यह बेचैन नहीं करता क्योंकि हमने समझौता कर लिया है कि इस देश में कोई सांसद गरीब नहीं हो सकता है। वह हमेशा अमीर ही होता है। करोड़पति। इसलिए सारंगी आश्चर्यजनक हैं। हैरान करने वाले हैं। डेमोक्रेसी पर इतराने के तौर पर इस्तेमाल किए जाने के लायक हैं लेकिन सच है कि 90 प्रतिशत करोड़पति सांसद देने वाली मतदाताओं की जमात के गाल पर सारंगी तमाचा हैं। कि होश में आ जाओ और देखो। विकल्प का रोना न रोओ। बनो और चुनो।

Saturday, 4 May 2019

केजरीवाल पर हमला: लोकतान्त्रिक प्रश्नोत्तर की भाषा

प्रतिक्रियाएं भी किसी मसले पर आपका पक्ष रखती हैं। केजरीवाल को थप्पड़ पड़ने पर अगर आप हंस रहे हैं तो राजनैतिक फीडबैक की इस अपसंस्कृति को आपकी हरी झंडी है। किसी नेता से नाराजगी हो सकती है। प्रधानमंत्री इजाजत भी दे सकते हैं कि 'जूतों से मारें' या 'दलित भाइयों के बदले हमें मारें' लेकिन तय हमें करना है कि लोकतांत्रिक प्रश्नोत्तर की भाषा क्या होगी? हम किस तरह के राजनीतिक पर्यावरण का निर्माण चाहते हैं?

क्या हम चाहते हैं कि नेता काम न करें या बेईमानी करें तो उन्हें पीटा जाए? या फिर प्रक्रियात्मक तरीके से चुनाव में अपने मताधिकार से उन्हें जवाब दिया जाए? अगर ज़ाहिर तौर पर पहली बात ग़लत लगती है, जो कि है भी, तो समझना चाहिए कि हमारी हंसी, हमारा मजाक ऐसी घटनाओं में लगातार वृद्धि में मदद कर सकता है। किसी पर जूता फेंकना, थप्पड़ मारना, जूतों से मारने जैसी अराजक प्रतिक्रियाएं लोगों के गुस्से का प्रतिनिधि न बनें बल्कि, लोगों में जवाब देने का लोकतान्त्रिक तरीका विकसित हो। इसके लिए, ऐसी घटनाओं की सामूहिक और सर्वदलीय आलोचना होनी चाहिए।

Friday, 12 April 2019

अलविदा 'लाफिंग गैस सिलेंडर' प्रदीप चौबे

माइक्रो कविताएं लिखने वाली 'महाकाया' का महाप्रस्थान, अलविदा प्रदीप चौबे

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प्रदीप चौबे को यमराज मिल गया। उन्हें ही मिल सकता था। जिंदा आदमी को यमराज मिलते कभी नहीं देखा-सुना है लेकिन उन्हें मिल गया था। यमराज ने पूछा- चौबे जी नरक जाना चाहेंगे या स्वर्ग। चौबे तपाक से बोले- नरक। क्यों? उत्तर मिला- पब्लिक तो वहीं मिलेगी। हास्य कवि को और क्या चाहिए?

पता नहीं प्रदीप चौबे अभी परलोक के किस मोहल्ले में होंगे, किस देश में होंगे। किस गांव में होंगे। वैसे वह मंचों से यह भी तो कहते रहे हैं कि मैं कॉन्फिडेंस का कवि हूं। तालियों की आदत लगाई ही नहीं। सामने एक भी श्रोता हो तो वह कविता पढ़ जाते हैं। उन्ही के मुताबिक एक किस्सा है जो वह मंचों से सुनाते थे कि किसी बड़े कवि सम्मेलन के आखिर में पंडाल में सिर्फ दो लोग बचे थे। एक श्रोता और एक कवि। प्रदीप चौबे कविता पढ़ रहे थे। उन्होंने उस एक श्रोता से कहा, जरूर आप मेरे लिए बैठे हैं, तो श्रोता ने कहा, अरे नहीं, आप पढ़के उतरिए। आपके बाद हमारा नंबर है।

अभी तक चौबे को कॉन्फिडेंस था कि वह एक श्रोता के लिए भी कविता पढ़ते थे। चाहे वह आखिरी श्रोता उनका उत्तरवर्ती कवि ही क्यों न हो। उस दिन उन्हें एक और शब्द मिला - 'ओवर-कॉन्फिडेंस', जो उनके श्रोता-कवि के पास था। जाहिर है, वह दूसरा कवि भी प्रदीप चौबे ही था। ऐसे में इतने जन-विरल परिसर में रहने वाले कवि की इच्छा के विरुद्ध और उनकी किस्मत की मंशा के समर्थन में इसकी पुरजोर संभावना है कि वह स्वर्ग की किसी शानदार कॉलोनी का बाशिंदा हुआ होगा।

एक तीसरी बात भी जो चौबे अपने बारे में मंचों से कहते थे, वो यह कि कविताएं वह लंबी नहीं लिखते हैं। वह इशारों के कवि हैं। इशारों में कहते-

'आप मुझे सुन रहे हैं यह मेरी खुशनसीबी है, आपकी जो हो'
.......

"पूछताछ काउंटर पर किसी को भी न पाकर 
हमने प्रबंधक से कहा जाकर- 
‘पूछताछ बाबू सीट पर नहीं है उसे कहां ढूंढें? 

जवाब मिला – ‘पूछताछ काउंटर पर पूछें!’"

.........

"पलक झपकते ही हमारी अटैची साफ हो गई 
झपकी खुली तो सामने लिखा था- 

इस स्टेशन पर सफाई का मुफ्त प्रबंध है।"

और, एक कविता में-

"हमारे पिता जी बहुत अच्छे पिताजी थे
उनकी बड़ी तमन्ना थी कि उनके घर में कोई फौज में जाए
उनको मैं ही पसंद आया
एक दिन मुझसे बोले- मैं देश की सेवा करना चाहता हूं
तू कल फौज में भर्ती हो जा"

यह दुनिया 'निंदक नियरे राखिए' की उल्टी दिशा में काफी आगे निकलती जा रही है। मजाक छोड़िए, लोग अपनी आलोचना तक सहन नहीं कर पाते। ऐसे में प्रदीप चौबे अपनी कायिक अवस्था को किसी कमी की तरह नहीं देखते, उस पर अफसोस नहीं करते, रोते नहीं बल्कि उसे हास्य की सामग्री बनाकर अपना ही मजाक उड़ाते हैं। अपने मोटापे पर उन्होंने न जाने कितने चुटकुले बनाए हैं। कितनी कविताएं भी लिखीं। लगभग उनकी हर कविता में यह चीज देखी जा सकती है। चाहे वह रेलयात्रा के कुली का जिक्र हो जिसके लिए

'बाबूजी आप किस सामान से कम हैं'

या फिर वह रिक्शावाला, जो उन्हें दो रुपये किलो के हिसाब से ले जाने की शर्त रखता है। अपना ही मजाक बनाते हुए कवि कहते हैं कि लोग किलोमीटर में यात्रा करते हैं और मैं किलो में करता हूं। ऐसा करते हुए वह अपने आपको डायनासोर तक कहने से गुरेज नहीं करते।

"मैं एक पिच्चर देखने गया जुरासिक पार्क। उसका हीरो डायनासोर था। जैसे ही मैं हॉल में पहुंचा लोगबाग मुझे देखकर ऐसे घूरने लगे जैसे मैं ही डायनासोर हूं। कुछ लोग तो टिकट फाड़कर घर जाने लगे। बोले- अब पिच्चर क्या देखना। हीरो तो यहीं है।"

अपना मजाक बनाना इतना आसान नहीं था। किसी ने लिखा है-

"इतना आसान नहीं खुद का तमाशा करना
कलेजा चाहिए औरों को हंसाने के लिए।"

औरों को हंसाते-हंसाते सामाजिक-राजनीतिक अव्यवस्थाओं की तस्वीर दिखा जाना प्रदीप चौबे अच्छी तरह से जानते थे। इसका अक्स उनकी खुद की शवयात्रा पर लिखी कविता और रेलयात्रा कविता में देखी जा सकती है। शवयात्रा कविता में बेहद औपचारिक और स्वार्थी हो चुके सामाजिक संबंधों का प्रतिबिंब पेश करते हुए चौबे उनके अंतिम यात्रा में आए लोगों के आपसी संवाद के माध्यम से कितनी बड़ी-बड़ी बातें कह जाते हैं। 

“हम अपनी शवयात्रा का आनंद ले रहे थे
लोग हमें ऊपर से कंधा और अंदर से गालियां दे रहे थे

एक हमारे बैंक का मित्र बोला -
कि इसे मरना ही था तो संडे को मरता
कहां मंडे को मर गया बेदर्दी
एक ही तो छुट्टी बची थी
कमबख़्त ने उस की भी हत्या कर दी

ये थोड़े दिन और इंतज़ार करता
तो जनवरी में आराम से नहीं मरता
अपन भी जल्दी से घर भाग लेते
जितनी देर बैठते सर्दी में
आग तो ताप लेते।”

उनकी रेलयात्रा कविता तो जैसे आम आदमी की खीझ है। 

भारतीय रेल की जनरल बोगी 
पता नहीं आपने भोगी कि नहीं भोगी।

सब जानते हैं कि जनरल बोगी में यात्रा नहीं होती। उसे भोगा जाता है। नरक की तरह। एक जनरल डिब्बे की क्या दुनिया है, क्या व्यथा है, क्या चिड़चिड़ापन है और इन सबसे कैसे हास्य तैयार होता है, वह सब इस कविता में आसानी से देखा जा सकता है। बहुत सी चीजों से हम समझौता कर ले जाते हैं। उस समझौते की हंसी उड़ाकर विद्रोह के बीज बोने का काम भी उन्हें आता है, यह प्रदीप चौबे ने इसी कविता में सिद्ध किया है। 

"किसी ने पूछा- पंखे कहां हैं
उत्तर मिला- पंखों पर आपको क्या आपत्ति है
जानते नहीं, रेल हमारी राष्ट्रीय संपत्ति है
कोई राष्ट्रीय चोर हमें घिस्सा दे गया है
संपत्ति में से अपना हिस्सा ले गया है"

यह व्यंग्य किसी प्रशासन पर नहीं बल्कि जनता पर था। हास्य-व्यंग्य में ज्यादातर निशाना प्रशासनिक संस्थाएं होती हैं। प्रदीप चौबे जरूरत पड़ने पर आम आदमी पर भी व्यंग्य करते हैं।

"टीचर के पास बटुआ
इससे अच्छा मजाक इतिहास में आज तक नहीं हुआ।"

मैं हास्य कवि प्रदीप चौबे से कभी मिला नहीं। यह जानने की बड़ी अभिलाषा थी कि जिस ‘महाकाया’ के कवि सम्मेलन के मंचों पर उपस्थित रहने भर से ही माहौल हंसने-परिहास करने लगता था, उसका व्यक्तिगत जीवन भी क्या ऐसी ही चुहलबाजी, हास-परिहास से भरा था। लेकिन, चौबे से कभी मिलना नहीं हुआ। ग्वालियर उनका घर था। कभी ग्वालियर जाना भी नहीं हो पाया। कवि सम्मेलन में भी कभी उन्हें सामने से नहीं सुना। यू ट्यूब पर उन्हें खूब सुना है। पिछले साल का एक विडियो हाल ही में देखा था। चौबेजी के गुदगुदाने वाले चेहरे पर एक अजीब सी उदासी और असमर्थता थी। देखकर बड़ी तकलीफ हुई। यह तकलीफ आज के शोक के साथ घुल गई है। यह और पीड़ादायक है।

प्रदीप चौबे हमारे बीच नहीं हैं। माइक्रो कविताएं लिखने वाली महाकाया का महाप्रस्थान हो चुका है। हास्य का आकाशदीप सशरीर बुझ चुका है लेकिन अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाते हुए संसार को मुस्कुराने-हंसने के तमाम बहाने देकर हमारा पूर्वज विदा हुआ है। उसके लगाए हास्य के पौधे हंसी की हवाएं न जाने कितनी नस्लों तक फैलाते रहेंगे। हम हंसते रहेंगे और प्रदीप चौबे को जीवनभर याद करते रहेंगे।

विदा हास्यकवि

मौत आई तो ज़िंदगी ने कहा-
'आपका ट्रंक काल है साहब' 

Thursday, 11 April 2019

डरिए नहीं, डराने वालों को कीजिए रिजेक्ट

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डर हमेशा कमजोरी का पर्यायवाची नहीं होता। दुनिया की सबसे बड़ी विभत्सताएं इसी के साए में पली-बढ़ी और घटित हुई हैं। डर का इस्तेमाल सत्ता एक्सीलरेटर की तरह करती है। जितना ज्यादा जोर देंगे, उनकी गाड़ी उतनी ही आगे बढ़ेगी। यह सच नहीं है क्या कि डर इंसान के अंदर एक अबूझ, बर्बर और अनजान ताकत पैदा कर देता है। इस बारे में उस डरे हुए इंसान को भी पता नहीं होता। दुनिया भर में धर्म संरक्षण, जाति संरक्षण और राष्ट्रीयता संरक्षण के नाम पर जितने भी नरसंहार हुए हैं, उनके मूल में क्या इसी डर के बीजरोपण का मंत्र नहीं है।

'तुम प्रतिकार करो, प्रहार करो, नहीं तो तुम्हारा अस्तित्व खत्म हो जाएगा।' यह ध्येय वाक्य किसे उन्मादी नहीं बना देगा। आखिर हर कोई बच जाना तो चाहता ही है। सत्ताएं यही डर आपके भीतर बोती हैं। आप अपने ही देश को लीजिए। चुनाव का मौसम चल रहा है। वादों-दावों के बीच अक्सर दलों के नेता इस बात पर जोर डालना नहीं भूलते कि 'फलां पार्टी सत्ता में आएगी तो आपको बरबाद कर देगी। देश को विनष्ट कर देगी। आपके धर्म को खत्म कर देगी। आपके बीच खाई पैदा कर देगी। आपके समुदाय के लोगों का खात्मा कर देगी', वगैरह-वगैरह। यह डर का बीज नहीं है तो क्या है।

डर के आधार पर आपसे वोट ही नहीं मांगे जाते, आपको भड़काया जाता है। आपके मन में नफरत बोई जाती है। दो घरों के बीच दीवार नहीं खड़ी की जाती, खाई खोदी जाती है। सत्ताएं आपके सामाजिक साहचर्य की क्षमता, योग्यता, विवेक और प्रतिभा पर सवाल उठाती हैं। वे लगातार आपके अंदर प्रेम के साम्राज्य को चुनौती देती हैं। वे वहां नफरत की कॉलोनियां बनाती हैं और आपका हृदय उन्माद का उपनिवेश होता जाता है। इसलिए, गुलामी से बचना है तो विवेक जगाइए। प्रेम बढ़ाइए। डरिए नहीं क्योंकि डर बर्बरता को जन्म दे सकता है, संरक्षण की गारंटी नहीं।

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डर के बीज से उगी वीरता कभी सार्थक और उपयोगी नहीं हो सकती। अफ्रीका के रवांडा में 25 साल पहले एक भीषण नरसंहार हुआ था। उसकी बुनियाद नफरत थी और नफरत की जड़ में था लोगों के मानस में बोया गया डर का रक्तबीज। हुतु समुदाय के लोगों में यह डर भरा गया कि तुत्सी लोग गैर-ईसाई हैं और वह तुत्सी-साम्राज्य कायम करना चाहते हैं। रवांडा के एक रेडियो स्टेशन ने यह आह्वान किया था कि तुत्सियों का सफाया करने का वक्त आ गया है क्योंकि हमें अपना अस्तित्व बचाना है। तकरीबन 8 लाख लोग इस डर की भेंट चढ़ गए। उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई। इनमें केवल अल्पसंख्यक तुत्सी ही नहीं थे बल्कि हुतु समुदाय के वे लोग भी शामिल थे जो शांति की बात करते थे। जो थोड़े नरम थे।

हमारे देश में अभी ऐसा माहौल नहीं है कि हम नरसंहार तक पहुंचे लेकिन यह जानने-समझने वाली बात तो जरूर है कि चिंगारियों की तीव्रता ज्यादा नहीं होती लेकिन असावधानी उनके विकराल रूप को आमंत्रण दे सकती है। बीज और फिर पौध कोई विशालकाय पदार्थ नहीं होता लेकिन धीरे-धीरे पोषण मिलने पर वह हमारी बेखबरी के पीछे एक बड़ा वृक्ष बन जाता है। इसलिए, बेखबर न रहिए। हवा की गंध को सूंघिए, पहचानिए और कोशिश कीजिए कि जितनी मात्रा में लोग आग बो रहे हैं, हम उस हिसाब से उस पर पानी डालें। मन की मजबूती में भय नहीं पनपता। भय की अनुपस्थिति में हिंसा नहीं जनमती। ऐसे में चुनाव प्रचार में वादों-दावों और उकसाए जाने वाले भाषणों में डराने की भाषा को पहचानिए।

नेताओं की उकसाने वाली भाषाएं अराजकत तत्वों को अभयदान देती हैं। वह जिस भीड़ की आड़ लेते हैं, वह ऐसे ही कथित संरक्षणजन्य भय के बहकावे में आकर उनके साथ होती हैं। पहलू खान, अखलाक, जुनैद और ऐसे ही न जाने कितने ही अल्पसंख्यक समुदाय के निर्दोष रवांडा की तर्ज पर बहुसंख्यक समुदाय की भीड़ का शिकार हो रहे हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि केवल निजी राजनैतिक फायदे के लिए सामाजिक सद्भाव में भय का यह जहर घोला जाता है। नयति इति नेता के भावार्थ से उपजने वाले शब्द को धारण करने वाले लोग समावेशी राजनीति करने की बजाय सामुदायिक और विभाजनकारी राजनीति को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं।

अगर हमें यह लगता है कि ऐसे लोगों की भारतीय राजनीति में जगह नहीं है तो इन डराने वाले नेताओं को रिजेक्ट कीजिए और डरना भी बंद कर दीजिए। अपने विवेक पर भरोसा रखिए। सामाजिक विश्वास बनाए रखिए क्योंकि बांटना अगर सत्तालोलुपता की जिम्मेदारी है तो नागरिकता की जिम्मेदारी है कि वह पुल बने। ताकि, सारी घृणा, सारे षड्यंत्र उसके नीचे से बह जाएं और लोगों का एक-दूसरे के गांव-देश में आना-जाना बना रहे।