जनता राजनेताओं के तिकड़म से त्रस्त थी। उसे ऐसा लगता था कि पक्ष-विपक्ष सारे आपस में रिश्तेदार हैं। एक दूसरे को समझते हुए राजनीति के अभिनय से उन्होंने टीवी की एक ऐसी फिल्मी दुनिया बना ली थी, जहां से आम जनमानस खुद को उनके करीब होने का आभास पाता था लेकिन था नहीं। ऐसे समय में आम आदमी की रंगत वाला और ढीली-ढाली शर्ट पहनने वाला तेज और धमक भरी आवाज से अपने दावों को प्रभावशाली बनाकर कहने वाला एक व्यक्ति आंदोलन के रास्ते राजनीति के उस अभेद्य टीवीय गलियारे में घुस जाता है और वहां के लोगों की पोल खोलता-सा लगता है। जनता समझती थी कि राजनेताओं के अभिजातीय संगठन में अपने किसी आदमी ने सेंधमारी की है।
यह सेंधमारी कभी किसी की कल्पना में भी नहीं आ सकती थी लेकिन अरविंद केजरीवाल की हिम्मत इसे साकार कर रही थी। ऐसे में जनता को लगा कि इसको थोड़ा जोर दिया जाए तो आम जनता और राजनेताओं के बीच के अपारदर्शी दीवार को तोड़कर सारा राजनैतिक संसार समतल किया जा सकता है। लोगों ने नौकरियां छोड़ीं। पढ़ाई से ब्रेक लिया। अपने शोधकार्यों को छोड़कर आम आदमी पार्टी के प्रचार के लिए दिल्ली पहुंच गए। जो नहीं जा सके, वो सोशल मीडिया और फोन कैंपेन जैसे साधनों से अपना योगदान देने लगे। अरविद केजरीवाल देश में उम्मीद का चेहरा बन गए। उनके आसपास के लोग फरिश्ते लगते थे, जिन्हें देखकर लगता था कि ये लोग मिलकर जनमानस की एकजुट ऊर्जा के सहयोग से देश की सारी विषमताओं को खत्म कर देंगे।
आम आदमी की पार्टी सरकार बनाए। इस देश के सरकारी तंत्र में आम आदमियों की मौजूदगी से 'राजनेतातंत्र' में तहलका मच जाने के यूटोपियन रोमांच से भरे लोगों ने एक अफसर और फिर ऐक्टिविस्ट अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री बना दिया। मुख्यमंत्री भी उस दिल्ली का, जहां देश का पूरा केंद्रीय सत्तातंत्र मौजूद है। लेकिन, सच बात है कि सत्ता की कुर्सी में कुछ तो गड़बड़ है। जैसा कि केजरीवाल भी कहते ही थे। वहां पहुंचते ही कोई भी आम आदमी नहीं रह जाता। किसी रासायनिक विलयन की तरह सत्ता का तंत्र ऐसे तमाम आम आदमियों को तोड़-मरोड़कर 'राज' नेता की मिट्टी में बदल ही डालती है। केजरीवाल के साथ भी यही हुआ होगा। धीरे-धीरे लगा कि व्यवस्था परिवर्तन के उनके जज्बे में सत्तालोभ का कीड़ा पड़ गया है।
उन्हें न सिर्फ किसी भी कीमत पर अपनी कुर्सी बचाए रखनी थी बल्कि ताकत बढ़ाने की लालची जल्दबाजी में किसी नौसिखिए राजा की तरह वह सत्ता का अश्वमेध यज्ञ करने लगे थे। ताकत का अहंकार भी यदा-कदा उनके भीतर दिखा। उनके क्रांतिकारी और निःस्वार्थ व्यक्तित्व से उघड़कर उनकी महत्वाकांक्षाएं सतह पर दिखने लगीं। वह तुष्टीकरण करने लगे। समझौता करने लगे। सांप्रदायिकता से परहेज भी छोड़ दिया। समन्वयता से दुश्मनी ठान ली। दोस्तों को विदा किया या उन्हें नाराज होकर जाने दिया। बौद्धिक लोगों से चिढ़ने लगे। जिम्मेदारीपूर्ण और गंभीर बातों से जैसे तौबा कर लिया। सरकारी पैसों से एक आत्ममुग्ध किस्म के प्रचार-प्रसार में सबको पीछे छोड़ने लगे।
अगर केजरीवाल को भी यही होना था तो ऐसे लोग तो गुंजाइश से ज्यादा मात्रा में हिंदुस्तान की राजनीति में उपलब्ध थे। अगर यही होना था तो ये काम तो वे लोग ज्यादा बेहतर करते थे। विचारधारा या सिद्धांतों की जड़ में राजनैतिक पार्टियां पनपती हैं। जब तक वह इस जड़ में हैं, जमीन से भोजन-पानी खींचती रहेंगी। यह जड़ ही काट दिया तो पनपने की वजह ही खत्म हो गई। केजरीवाल शायद अपनी जड़ों से उखड़ गए थे। वह किसी और की बल्कि कई और की जड़ों से पनपना चाहते थे। इन सबकी वजह से धीरे-धीरे वह लोगों से अपने प्रति सहानुभूति को खोते चले गए। यही कारण है कि भाजपा को पसंद न करने वाले लोगों को भी दिल्ली में उनकी हार पर कोई दुख नहीं हुआ। लोगों ने इसे उनके अहंकार का नतीजा बताया।
ईमानदारी और सैद्धांतिक होने का भी अपना एक अहंकार होता है। लोग उसे त्रस्त हो सकते हैं लेकिन उसके प्रति सम्मान का भाव फिर भी रखते हैं। केजरीवाल का कथित अहंकार शायद उनके पूर्व सिद्धांतों से भटक गया था। वह सत्ता, ताकत और अपनी आत्ममुग्ध सस्ती सियासी चतुराई से अपनी ऊर्जा पाने लगा था। आंदोलन के जमाने में उनकी बातों में सत्य और तथ्यात्मकता का गुरुत्व दिखता था। नेता और मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रलोभनी और व्यर्थ सच-झूठ से सने उनके भाषण खोखले होते चले गए। उनके पहले के बौद्धिक समर्थकों में ये बातें चिढ़ पैदा करने लगीं। हालांकि, यह उनकी हार का मुख्य कारण नहीं रहा लेकिन यह उनके पतन के एक पड़ाव के तौर पर नोट किया जा सकता है।
चुनावी राजनीति में उनके पतन के अनेक कारण हो सकते हैं। उसका विश्लेषण अलग बात है लेकिन दिल्ली चुनाव की हार में एक बात साफ है कि उनके वोटर्स का रोष उन पर टूटा है। यह विशुद्ध रूप से भाजपा की जीत से ज्यादा केजरीवाल की हार के तौर पर उल्लेखनीय बात है और केजरीवाल की ये हार भारतीय राजनीति में उम्मीद और विश्वास की एक मरणासन्न ज्योति के बुझने की इति घटना है।
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