अब ऐश्वर्य भैया ने ‘विदाई लॉग’ भेज दिया है तो ये बात तय है कि एनबीटी-एल के दफ्तर नहीं आना है। वापस लौटने की तमाम संभावनाओं के बीच भी यह सत्य तो अपनी जगह है कि 6 साल की एक आदत और दिनचर्या का केंद्र बन गए इस ऑफिस से नाता-रिश्तेदारी को फिलहाल विराम देना होगा। जीवन में इच्छा और आवश्यकता से तालमेल बिठाना कितना कठिन काम है, यह भी ऐसे ही मौके पर समझ में आता है। संभावनाओं की पुकार और मनोवांछित के गुरुत्व के बीच संघर्ष का नाम ही विदाई है। एनबीटी में आखिरी दिन ऐसी ही मिश्रित अनुभूतियां हैं और मन में तमाम ऐसी स्मृतियां जो यहां घटीं और जीवन के सबसे बेहतरीन दिनों की लिस्ट में शामिल हो गईं।
एनबीटी में शुरुआती दिन नौकरी का भी प्रारंभिक चरण भी था। पत्रकारिता या कंटेंट राइटिंग की जो भी भूमिका थी, उसका शैशव काल। कह सकते हैं कि इस क्षेत्र में जो भी सीखा, जितना भी सीखा, जैसा भी सीखा.. वह नवभारत टाइम्स ऑनलाइन की टीम से, यहां के मार्गदर्शकों से ही सीखा। उम्मीद यही है कि यह वाक्य संस्थान के लिए गर्व का विषय बने, आरोप का नहीं (😂)। नौकरी के लिए जो भी बातें छात्र जीवन में या उसके बाद सुनीं थीं, वह कई बार सकारात्मक नहीं थीं। जीवन और श्रम के असंतुलन के नाम से इस जिम्मेदारी को बहुत ठीक नहीं कहा जाता था लेकिन जब हम यहां आए नवभारत टाइम्स ऑनलाइन ने इस धारणा पर ठीक-ठाक चोट की। हालांकि, समय एक सा नहीं रहता। व्यवस्था हमेशा एक सी नहीं रहती। फिर भी, काम करने की जैसी सुविधा, संभावना और अवसर यहां मिला, वह और कहीं भी दुर्लभ ही है।
अब यहां से जा रहे हैं तो उथल-पुथल से भरा जीवन का एक चैप्टर पूरा हुआ मान रहे हैं। चैप्टर जिसमें ढेर सारे दोस्त बने, हितैषी मिले। एक जमाने की बात हो गई जब नीलेश मिश्रा का शाम की शिफ्ट में इंतजार करते थे कि उसके आते ही दफ्तर का गंभीर माहौल ठहाकों से भर जाता था। बगल की डेस्क पर बैठने वाली आकांक्षा शर्मा जो दोस्त थी लेकिन नोकझोक और लड़ने भिड़ने में पड़ोसन धर्म का खूब निर्वाह करती थी। शताक्षी अस्थाना की अभिन्न मित्रता और संगत यहां की सर्वश्रेष्ठ यादों में से एक है। ऐसी संगत जो ऑफिस के काम से लेकर कैंटीन के खाने और फिर एक ही रास्ते से घर जाने तक की सहचरता में फैला हुआ था। श्रेयांश त्रिपाठी जो दफ्तर में दोस्त बने लेकिन अब जीवन में ज्यादा शामिल हैं। ऑफिस की कुर्सी पर बैठे अचानक से उनके कैमरे में 'डीपी' के लिए तस्वीर के रूप में खींच लिए जाते थे। दफ्तर के बाद चाय से लेकर डिनर की तहरी तक का संबंध बनने की रंगभूमि तो यही एनबीटी का दफ्तर था।
काजल मैम भी थीं, जिनके जीवन को देखने का नजरिया काफी अनुकरणीय था। वह इसे समस्या के नहीं समाधान के नजरिए से देखती थीं और प्रेरित करती थीं कि हम भी उदासी के अंधकार और जाल से निकलकर जीवन को सुंदर बनाने पर काम करें। पंकज श्रीवास्तव सर को याद करना भावुक होने वाला काम है। वह हमारे 'छत्रपति' थे। एनबीटी में हमारी यादों को शानदार बनाने का जिम्मेदार उन्हें ही कहा जा सकता है। हमारे बीच ओहदे का और उम्र का भी बड़ा अंतर था लेकिन इस अंतर में जैसी सहजता से आवाजाही उनके साथ संभव थी, वह उन्हें हमेशा सम्मान के साथ याद करने के लिए प्रेरित करती है। प्रभाष सर का विश्वास कि ‘इस विषय पर लिखो। तुम अच्छा लिखोगे’ याद आता है और लगता है कि नेतृत्व का काम यही है कि अपनी टीम के लोगों से उसका अपना सबसे बेस्ट निकलवा कर पूरी टीम के लाभ को सुनिश्चित करे। इस भरोसे से जो ऊर्जा मिलती है उसका कोई सानी नहीं है।
आईटी वाले एक रवि पांडेय उर्फ संडे पांडेय थे जो दुनिया के इकलौते कर्मठ और काम के व्यक्ति हैं, जो 'किसी काम के न होने' के विशेषण को ढोने के लिए अभिशप्त थे। यह सब उनकी सरलता और मासूम हंसी की वजह से था और उनके मजाक को मजाक की तरह लेने की असीम सहनशीलता की वजह से भी। खाने पीने और ग्राउंड रिपोर्ट के शौकीन मिथिलेश भैया से जो आत्मीयता यहाँ बनी वह दफ़्तर के बाहर भी अनवरत ज़ारी है। अजय उर्फ बिल्लू, चाचा उर्फ सुरेश, विक्रम, नीरज और आलोक के विनम्र सहयोग को भी याद करना जरूरी है, जिन्होंने पुराने ऑफिस बिल्डिंग में हमारा काम काफी आसान किया। आज भी एक आवाज पर मदद के लिए तैयार रहते हैं।
ये सभी लोग अब नभाटा में नहीं हैं लेकिन उन्होंने यहां के अनुभवों को शानदार बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। फिलहाल, जिस टीम को छोड़कर हमें जाना है, वह भी ऐसी है कि विदाई मुश्किल कर रही है। ऐश्वर्य भैया तो लखनऊ में गार्जियन की तरह रहे। ऑफिस से लेकर घर तक जिनकी देखभाल में हमारा अनुशासनहीन और लापरवाह जीवन छांव पाता। उनके गजब के हास्यबोध का तो पूरा दफ्तर गवाह है ही। यहां से जाने के बाद भी वह ऐसे ही संगी रहेंगे, यह तय बात है। अभिनव के शांत-गंभीर व्यक्तित्व में चपलता की भी छौंक है, यह उनका करीबी होकर ही समझा जा सकता है। दफ्तर हो या जीवन, कहीं की भी निराशा हो या उदासी... अभिनव ऐसे माहौल के पनाहगाह हैं। उनका दुख है कि चाय पिलाने और छोटा भटूरा खिलाने वाली संगत अब दफ्तर में न होगी... तो उनके लिए प्रार्थना है कि जल्द से जल्द ऐसी संगत उन्हें प्राप्त हो और वह उसके लिए थोड़ी मेहनत भी करें।🙄
सुशील भैया के असंख्य बिजनस आइडियाज समय-समय पर मिलते ही रहेंगे, ऐसी उम्मीद है। उनका उदार और गजब का सहयोगी व्यक्तित्व याद आएगा। अजयेंद्र सर का प्रशासक के तौर पर व्यक्तित्व निर्दयी नहीं सामंजस्यशील है। हालांकि, टीम लीड के तौर पर हमने उनकी कठोरता भी झेली ही है लेकिन वह अपनी सरल और मुस्कानपूर्ण बातों से सब फिर से समतल कर देते हैं। अच्छा ये लगता है कि निजी जीवन हो या दफ्तर... जब वह किसी विषय पर दिशा निर्देशित करते हैं तो उनमें उनका 'मैनेजर' आसपास नहीं दिखता। ऐसा लगता है कि परिवार का कोई सदस्य हमारे भले की ऐसे समझा रहा हो जैसे हमारा भला-बुरा होने से वह भी प्रभावित होगा।
आलोक भदौरिया सर महात्मा और विद्वान व्यक्ति हैं और यह आप उनके व्यवहार, बातचीत और ज्ञान से पहली ही मुलाकात में समझ सकते हैं। हमारे बीच ऐसे संबंध हैं कि उम्र का बड़ा अंतर कभी आड़े नहीं आया। किसी भी विषय पर एक सामान्य जानकारी चाहिए तो हम उनकी ही शरण जाते हैं। वैभव भैया के 'पार्लेजी बिस्कुट' को तो काफी याद किया जाएगा। हंसमुख स्वभाव और बड़े भाई जैसा स्नेहशील व्यक्तित्व उनका है, जो हमारे और उनके प्रतापगढ़ के साझा संबंध की वजह से और गाढ़ा हो जाता है।
'राधे-राधे' वाले विवेक मिश्रा, धीरेंद्र सिंह धीरू और अभिषेक शुक्ला के ग्रुप में होने वाले 'विश्वयुद्ध' टाइप की लड़ाई को बहुत याद करेंगे। हमारे 'वेदव्यास' राहुल पराशर भैया जिनको 'चित्रगुप्त' से लेकर लिखने वाले हर महापुरुष के नाम की उपाधि हम लोग दे चुके हैं, याद आएंगे। शशि मैम जो अनादि काल से दफ्तर का रास्ता भूल गई हैं, उनके अन्नपूर्णा स्वरूप का स्मरण करने से शायद जीवन में धन्य-धान्य की कमी न हो। चंद्रा सर नोएडा से लखनऊ आकर बसे तो पता चला कि कितने दिलचस्प व्यक्ति हैं। अपनी धारणा और विचारधारा पर उग्रवादी व्यवहार वाले समय में भी किसी भी बहस के दौरान वह किस गंभीरता और शांति से अपनी बात रखते हैं, यह तो सभी को उनसे सीखना चाहिए।
शैलेश सर से समोसा वाली पार्टी न देने की लड़ाई रूस और यूक्रेन वॉर की तरह चलती ही रहेगी। मेरे ब्याह का न्योता वह इसी मेल को समझें। जब भी, जिससे भी और जहां भी होगी वह सादर आमंत्रित हैं। गीतिका मैम को 'इनकी बातें तो देखो' जैसे वाक्यांशों के अलावा गुझिया और न खिलाई गई आइस्क्रीम के लिए भी याद करेंगे। देवेंद्र भैया से 'संबंध खराब' नहीं हो पाया। लिट्टी का निमंत्रण बीच में आ गया, जो वह पता नहीं कब खिलाएंगे। (कणिका नहीं) कनिका सिंह का जो 2 बिस्कुट ले लिए थे, उसके लिए वह ताना कम मारें। इसके बदले में हम ये कह देते हैं कि बनारस ठीक-ठाक ही शहर है। अब हिसाब बराबर है।
आदर्श के प्रतिभाशाली खिलाड़ी से देर से पहचान हुई, जिसके दम पर हम लोग दो बार टूर्नामेंट खेल आए। कप्तान साहब उर्फ सौरभ यादव सर ने ही हमे जॉइन कराया था और आज निकाल भी वही रहे हैं। (यह ताना भी है क्या!🙄) दोनों करने में उनको बहुत मजा आया है। उनसे यही कहेंगे कि 'टूर्स ऐंड ट्रैवेल्स', 'मूवर्स और पैकर्स' से फुर्सत पाएं तो टीआईएल नवाब टीम पर भी ध्यान दें। अब काफी बेइज्जती हो गई है। ऐश्वर्या शुक्ला मैम का भंडार खान-पान की चीजों से सदैव भरा रहे और वीडियो टीम इससे लाभान्वित होती रहे। सुबह की शानदार नींद के चक्कर में नवाबों की टीम को 'मंझधार' में छोड़ देने वाले शिवा भाई भी खूब तरक्की करें। जैसा कैच उन्होंने मैच में पकड़ा, जीवन में बढ़िया अवसर वैसे ही लपकते रहें।
नोएडा के साथियों से कम मुलाकात है। भला हो गूगल मीट का कि वहां की टीम के साथ भी इंटरैक्शन का सौभाग्य मिला। अमित सर उर्फ डॉक्टर साहब हैं तो हमारी लखनऊ टीम का ही हिस्सा लेकिन ऑफिस से ज्यादा गूगल मीट पर ही अपनी अद्भुत हंसी के साथ मिलते रहते हैं। सुजीत भैया अपने बैग में रखा 'तलवार' देने के बाद से लापता हैं। इनको भय है कि कहीं हम भस्मासुर से न प्रेरित हो जाऊं। त्रिपुंड लगा लें तो यह भी शंकरजी लगते ही हैं। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से लेकर आईआईएमसी तक के सीनियर पंकज सर सामने आ जाएं तो शायद पहचान न पाएं लेकिन उनकी 'क्या ही कहें' कहती आवाज़ अगर महाकुंभ की 63 करोड़ की भीड़ में भी कहीं सुन लेंगे तो पट्ट से पहचान लेंगे कि वही हैं।
अशोक उपाध्याय सर आम आदमी पार्टी की हार के बाद भी अपने दुख को किनारे रख जैसे दफ्तर के गंभीर माहौल को हल्का करते हैं, बहुत ही भला काम है और उन्हें इसे जारी रखना चाहिए। ऐसा करते कई बार वह खुद शिकार बन जाते हैं लेकिन अपने 'गुरु' (चंद्रा सर के मुंह से जैसा सुना है) केजरीवाल की तरह कभी हार नहीं मानते। सत्यकाम सर तो 'कूल बॉस' वाले कैटिगरी में आते हैं। हमको याद है कि किसी खबर को जल्दी ब्रेक करने की हड़बड़ाहट में वह बातचीत में थोड़ा (थोड़ा सा ही) सख्त हो गए थे। बाद में उन्होंने इसके लिए अफसोस जताया और कहा कि दबाव में वह ऐसा कह गए। तभी ही उन्होंने दिल जीत लिया था। नवीन पांडेय सर, नित्यानंद सर, अभिषेक सर, धर्मेंद्र आर्य जी, अनुभव सर, अनिल जी, रुचिर सर, विश्वनाथ सर, अचलेंद्र सर, बब्बन सर, दिल प्रकाश सर, स्वप्नल सर, सत्यम परिदा जी, महेश रावत जी, शैलेंद्र जी... जिनसे मिलना न हुआ, उनसे मिलने की इच्छा है। कभी तो पूरी होगी। उसी का इंतज़ार है।
अखिलेश श्रीवास्तव सर के नेतृत्व में यह टीम हमेशा सर्वश्रेष्ठ रहेगी यह उम्मीद है। यही प्रार्थना है। वह शांत-सरल और प्रयोगधर्मी लीडर हैं, जिसे अपनी टीम पर अथाह भरोसा है। उनके भरोसे पर खरा उतरने वाली टीम भी है, जिसका हिस्सा हम रहे और जिसका हमेशा गर्व रहेगा। बात आज थोड़ी लंबी हो गई है। मौखिक इतनी बातें की होतीं तो दो-तीन दिन लगता। पढ़ने में भी तो एक-दो शिफ्ट का समय लग ही जाएगा। लेकिन 6 साल के विशाल अंतराल का यह पूर्ण विराम है। इसलिए बातें तो बहुत ज्यादा हैं ही। इतना के बाद भी हो सकता है कि कुछ लोग छूट रहे हों, जिनसे यहां कुछ नहीं कह पा रहे। ऐसे सभी लोगों को क्षमा सहित मेरी ओर से ढेरों शुभकामनाएं हैं। उनके सहित सभी खूब तरक्की करें। हमेशा स्वस्थ रहें। हमेशा प्रसन्न रहें।
बाकी...
मुसाफिर हैं हम भी। मुसाफिर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।
सभी को प्रणाम। धन्यवाद। शुक्रिया। मिलते-जुलते रहेंगे
सादर
राघवेंद्र