Sunday, 27 August 2017

सदा लगी हर तरफ से आने, फिराक़ साहब, फिराक़ साहब


हर किसी की जिंदगी के समानांतर एक और जिंदगी होती है और यह सबको दिखाई नहीं देती । यह जिंदगी का एक दूसरा रंग होता है, जो किसी चित्रकार के कैनवास पर तस्वीरों की शक्ल में अपने होने की सूचना देता है, तो कभी किसी शाइर की शायरियों में प्रकट होकर अपने अस्तित्व का आभास कराता है। रघुपति सहाय फिराक़ गोरखपुरी के जीवन के समानांतर की जिंदगी में किस हिज्र की कौन सी रात थी, इसका सही-सही पता तो किसी को नहीं है, लेकिन शायद उनकी इसी जिंदगी के पन्नों पर लिखे हिज्र, रात, इश्क के जानदार शेर उनके लफ्जों को वो हिम्मत और विश्वास देते थे जिनकी बदौलत फिराक़ गोरखपुरी बड़े आत्मविश्वास से कहते थे-

आने वाली नस्लें तुम पर रश्क़ करेंगी हमअस्रों,
जब ये ख्याल आएगा उनको, तुमने फिराक़ को देखा था।

हमें फिराक़ साहब को देखने और जमाने को रश्क करने के मौके देने का मौका तो नहीं मिला लेकिन लगभग दस सालों तक फिराक साहब के सान्निध्य का सुयोग पाने वाले जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रो. शमीम हनफी बताते हैं कि किस तरह से फिराक़ साहब की जिंदगी अकेलापन, विद्रोह, गुस्सा, करूणा, और मजाहियापन का अद्भुत मिश्रण थी। शमीम साहब के मुताबिक फिराक गोरखपुरी को उर्दू साहित्य ने तुरंत स्वीकार नहीं किया, इसका सबसे बड़ा कारण था उनकी शायरियों के रवायत से अलग हटकर चलने की प्रवृत्ति। उनकी शायरियों में एक तरह का खुरदुरापन था और वही उनका आकर्षण भी था।

28 अगस्त 1896 को गोरखपुर के एक कायस्थ परिवार में जन्में रघुपति सहाय अपने बीए की पढ़ाई के दौरान पूरे प्रदेश में चौथी वरीयता प्राप्त विद्यार्थी थे। इतना ही नहीं, वो उस दौर की सबसे प्रतिष्ठित और कठिन परीक्षा आईसीएस में भी चयनित हुए थे।  स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के प्रभाव में आकर नौकरी छोड़ देने वालों की लिस्ट में रघुपति सहाय का नाम तब जुड़ गया जब उन्होंने इसके लिए 1920 में सिविल सर्विस की नौकरी छोड़ दी। इसके बाद स्वतंत्रता संग्राम में वो कई बार जेल भी गए।

फिराक गोरखपुरी का व्यक्तिगत जीवन बहुत अच्छा नहीं था। वह अपनी शादी को अपने जीवन की सबसे बड़ी दुर्घटना मानते थे। कहा जाता है कि बेजोड़ शादी का यही दर्द उनके अशआरों में दिखाई देता है। 29 जून 1914 को जमींदार विंदेश्वरी प्रसाद की बेटी किशोरी देवी से उनका विवाह हुआ था। फिराक़ साहब अपनी पत्नी को पसंद नहीं करते थे। अपने दांपत्य जीवन के दांत पीसकर रह जाने वाली पीड़ा के बारे में बताते हुए वह अपने एक संस्मरण में कहते हैं, “मेरे सुख ही नहीं, मेरे दुख भी इस ब्याह ने मुझसे छीन लिए”। उनके दर्द को आप इस पंक्ति से भी समझ सकते हैं जिसको उन्होंने अपने इस संस्मरण में कोट किया है कि -  “मैं पापिन ऐसी जली कोयला भई न राख”

पत्नी के प्रति उनकी नफरत इस कदर थी कि किसी के भी सामने वो उन्हें कोसने से नहीं चूकते थे। इससे संबंधित एक संस्मरण यूं है कि इलाहाबाद में रहने के दौरान एक बार जब उनकी पत्नी गोरखपुर से आईं तब आते ही उन्होंने उनसे सवाल किया, “मरिचा के अचार लाई हो कि नहीं?”। उनके नहीं में जवाब देते ही वे बिफर पड़े और बोले, “जाओ, गोरखपुर से मरिचा का अचार लेके आओ, भूल कैसे गई?”

यह फिराक़ के जीवन का स्याह पक्ष कहा जा सकता है। जाने किस जीवनसाथी के पाने की अभिलाषा या फिर किसके पीछे छूट जाने का दर्द उन्हें रात, अकेलेपन और विरह का शायर बना देता है।  

“गरज कि काट दिए जिंदगी के दिन ऐ दोस्त,
वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में”

शमीम हनफी साहब बताते हैं कि फिराक़ को रात में जागने की आदत थी। उनके लिए रात सोने के लिए थी ही नहीं। रात की सोहबत का असर उनकी शायरियों में आसानी से देखा जा सकता है, जहां वो कहते हैं कि - 

“जमाना कितना लड़ाई को रह गया होगा।
मेरे ख्याल में अब एक बज गया होगा”।

“इसी खंडहर में कहीं कुछ दिए हैं टूटे हुए,
इन्हीं से काम चलाओ, बड़ी उदास है रात”।

“तुम चले जाओगे हो जाएगी ये रात पहाड़,
रात की रात ठहर जाओ कि कुछ रात कटे”।

“तबीयत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में,
हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं”।

उदास जिंदगी के अफसानों के बीच फिराक़ साहब के किरदार का एक और पहलू था, जो काफी मजाहिया और दिलचस्प किस्म का था। इलाहाबाद में रहने के दौरान फिराक़ साहब उस दौर के अन्य इलाहाबादी रचनाकारों की तरह कॉफी हाउस की महफिलों में भी जाया करते थे। कॉफी हाउस की कुर्सियों पर बैठकर जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी का यह प्रोफेसर अपनी बुलंद और गूंजती आवाज में शेर सुनाता तो वहां मौजूद लोग अपनी कुर्सियां खींचकर उनके चारों ओर बैठ जाया करते थे। उन्हें बोलने का बहुत शौक था। उस दौरान उनसे किसी ने पूछा कि आप इतनी बातें कैसे कर लेते हैं, तो फिराक़ साहब का जवाब था कि बातें कौन करता है, यह तो दिमाग सांस लेता है। उनकी आवाज जितनी कड़क थी, स्वभाव उतना ही नरम और विनम्र था। उनके जीवन का एक और संस्मरण यूं है कि एक बार अपने दिल्ली प्रवास के दौरान वो जिन सज्जन के यहां रुके हुए थे वो कुछ सालों बाद  उनसे मिलने इलाहाबाद आए। उनके दरवाजे पर पहुंचकर उनसे पूछा कि वो उन्हें पहचानते हैं कि नहीं। फिराक़ साहब के इंकार करने के बाद जब उन्होंने अपना परिचय दिया तब फिराक साहब ने उनसे एक चप्पल की ओर इशारा करते हुए कहा कि वह उठाइए, और मेरे सिर पर मारिए। मैं आपकी पहचान कैसे भूल सकता हूं।

राजनीति में भी रघुपति सहाय की बड़ी दिलचस्पी थी। जवाहर लाल नेहरू से उनके अच्छे संबंध थे। 1917 में जब फिराक़ गोरखपुरी राजनीति में आए तब नेहरू ने उन्हें 250 रुपए महीने पर आल इंडिया कांग्रेस कमिटी का अंडर सेक्रेटरी बना दिया था। बाद में नेहरू जब अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर अध्ययन के लिए विदेश चले गए तब फिराक साहब ने यह पद छोड़ दिया और इलाहाबाद चले आए। आजादी के बाद पहले आम चुनाव में आचार्य कृपलानी ने किसान मजदूर प्रजा पार्टी बनाई। इस पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 37 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इन 37 सीटों में से एक सीट गोरखपुर जिला दक्षिणी की भी थी जिस पर पार्टी के उम्मीदवार रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी थे। चुनाव में महज 9 फीसदी वोट पाकर फिराक कांग्रेस के सिंहासन सिंह से बुरी तरह हार गए। हारने के बाद फिराक साहब जब नेहरू से मिले तो उन्होंने हाल चाल पूछते हुए कहा, सहाय साहब, कैसे हैं, इस पर सहाय साहब का जवाब था सहाय कहां, अब तो बस हाय रह गया है।

रघुपति सहाय अपने समय के जाने-माने विद्वानों में गिने जाते थे। उर्दू, अंग्रेजी और हिंदी में उनकी लगभग 10 कृतियां साहित्य में मौजूदगी रखती हैं। उनकी कृति गुले नग्मा को साल 1970 में साहित्य का ज्ञानपीठ पुरस्कार भी हासिल हुआ है। इसके अलावा इसी कृति को साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है। अपनी शायरी के दम पर उर्दू साहित्य में फिराक गोरखपुरी नए तरह की गजल के प्रवर्तक माने जाते हैं। भारतीय संस्कृति की अथाह जानकारी, जीवन के कड़वे अनुभव और उन अनुभवों को गजलों और नज्मों में बांधने की क्षमता उन्हें एक विशिष्टता प्रदान करती है। प्यार, मोहब्बत, दर्द, विरह को शब्द देकर फिराक़ युवाओं की आवाज में गाए जाने वाले सबसे चहेते गीत माने जाते हैं। और इसीलिए, सुख़न की हर महफिल में फिराक़ गोरखपुरी एक अद्भुत और प्रभावशाली उपस्थिति हुआ करती थी, जिसके लिए उन्होंने खुद ही लिखा है कि

रहे सुखन में बचा के नजरें हर एक की मैं जहां से गुजरा,
सदा लगी हर तरफ से आने फिराक़ साहब – फिराक़ साहब।। 

Thursday, 3 August 2017

कविताः काग़ज़ पर कुछ लिख दूं

काग़ज़ पर कुछ लिख दूं,आखिर,
कुछ दिन से सोच रहा हूँ।

दिल का भूतल उथल-पुथल,
कुछ दबी हुई शै का हलचल,
कुछ पीर, नयन का नीर, कलम का 'मीर'
उगलने में संकोच रहा हूँ।
काग़ज़ पर कुछ लिख दूं, आखिर,
कुछ दिन से सोच रहा हूँ।

जीवन की जाने कौन राह!
जिस पर स्वप्नों का आत्मदाह।
कुछ शोर, जनम का भोर, जुनूनी जोर
के शव को नोच रहा हूँ।
काग़ज़ पर कुछ लिख दूं, आखिर,
कुछ दिन से सोच रहा हूँ।

दिन अंधियारे से लगते हैं,
सोते-सोते भी जगते हैं।
कुछ वर, ह्रदय का स्वर, ज्यों तीखे शर
से फोड़े कोंच रहा हूँ।
काग़ज़ पर कुछ लिख दूं, आखिर,
कुछ दिन से सोच रहा हूँ।

©राघवेंद्र

Thursday, 27 July 2017

दोहे: जी में आए फूंक दें, गीता और कुरान

दिल्ली से बंगाल तक, लहू-लहू-अंगार।
आर्यवर्त में चल रहा,संस्कृति का श्रृंगार।

ज़हर-ज़हर हर शहर में,नफरत की दुर्गंध।
घर टूटे पर बन रहा, है वैश्विक सम्बंध।।

राष्ट्रवाद बंधक बना,मानवता असहाय।
राजनीति के व्यूह में, मंदिर-मस्जिद-गाय।

संसद की बेचारगी, जन-गण का दुर्भाग।
कैसे हो प्रतिरोध जब, चूनर में है दाग।।

गलियां हैं सहमी हुईं, चौराहे खामोश।।
लुच्चे खोते होश हैं, सरकारें बेहोश।।

'काम' के बदले लाठियां, 'दाम' के बदले मौत।
'जाम' के बदले लोन है, 'नाम' के बदले मौत।

तलवारों की नोक पर, कितने पहलू खान!
इतना सस्ता हो गया, आखिर कब इंसान?

देख तेरे संसार की, क्या हालत भगवान।
जी में आए फूंक दें, गीता और कुरान।

Sunday, 23 July 2017

अनुभवों के अध्याय सरल नहीं होते

अनुभवों के अध्याय सरल नहीं होते लेकिन समझ में सरलता से आ जाते हैं। आज बहुत सी चीज़ें अनुभव के रास्ते दिमाग में आ चुकी हैं और कुछ धारणाओं और मान्यताओं के रूप में परिणत हो चुकी हैं। अब ज़िन्दगी थोड़ी-थोड़ी समझ भी आने लगी है। जब भी मन उदास होता है हम ज़िन्दगी की परिभाषाएं पढ़ने बैठ जाते हैं। जब भी हम निराश छोटे हैं किस्मत के अर्थ टटोलने लगते हैं। जब भी हम हारते हैं तो बजाय अपनी कमियों पर सुधारात्मक दृष्टि डालने के हम उन कमियों पर घुटने टेक देते हैं। सबकी तो नहीं लेकिन बहुतों की यही कहानी है। मेरी भी इसलिए है क्योंकि मैं केवल अनुभव लिख पाता हूँ और आज भी मैं वही लिख रहा हूँ।

अपना स्वयं का अध्ययन करना, खुद की पड़ताल करना अपने आप को पहचान लेना कितना ज़रूरी है? यह ज़रूरी भी है या नहीं? मुझे ऐसा लगता है कि यह मानसिक तनाव और हीन भावना के अलावा कुछ भी सृजित कर पाने के लायक नहीं है। इसलिए इसके बदले किसी महापुरुष की जीवनी पढ़नी चाहिए। कोई अच्छा सा लेख पढ़ना चाहिए।

मैंने अपने आप को बहुत पढ़ा है। मेरी हर आदत पर विश्लेषण किया है। इससे मुझे पता चला कि मुझमें एक नहीं, दो नहीं हज़ारों कमियां हैं। मैं जानता हूँ कि इनका परिणाम अच्छा नहीं होगा, फिर भी मैं इन कमियों में सुधार नहीं कर पा रहा। यह भी मेरी एक कमी ही है। मेरे साथ यह भी दिक्कत है कि मुझे अपनी सारी गलतियां पता होती हैं। मुझे पता होता है कि मैं जो कर रहा हूँ या करने जा रहा हूँ वो गलत है फिर भी मैं उसके लिए कुछ भी नहीं कर पाता। अपने आप को कोसने के सिवाय। एक वाकया है ऐसा कि एक बार दारागंज इलाहाबाद के रेलवे स्टेशन पर अपने मित्र राकेश से बात करते हुए मैं अपनी कही किसी बात को याद करने की कोशिश कर रहा था और यह भी कि ये बात मैंने कही किससे थी। हल्का सा संकेत पाते ही राकेश बोल पड़े कि बात यह थी और आपने मुझसे ही कही थी। आगे जोड़ते हुए उन्होंने जो कहा था उस पर मुझे हंसी भी आई और बात कम से कम मेरे लिये तो चिंतन का विषय थी ही। उन्होंने कहा कि दिन भर आप अपने आपको कोसते ही तो रहते हैं।

मुझे ख़ुशी है कि मुझमें आत्ममुग्धता नहीं है, आत्मप्रशंसा की आदत नहीं है, शायद अहंकार भी न हो, लेकिन इस बात की चिंता भी काम नहीं है कि मुझमें खुद के बारे में अच्छा महसूस करने की भी आदत नहीं है। पता नहीं टैलेंट वगैरह का स्तर मुझमें कितना है! लोगों की आशाएं मुझे कभी कभी डरा देती हैं। कभी कभी नहीं शायद हमेशा ही। इससे आत्मविश्वास गिरता है, आत्मबल कमजोर होता है। कभी कभी मैं कई प्रतियोगिताएं इसीलिए ज्वाइन ही नहीं करता हूँ कि मन में पहले से ही धारणा बन जाती है कि यह जीतना मेरे वश की बात नहीं।

मेरे आस-पास रहने वाले लोगों से पूछिए! शायद उनको मेरी अच्छाइयों से ज्यादा मेरी कमियों के बारे में पता हो! ऐसा इसलिए कि मैं दिन भर उसी पर विमर्श करता रहता हूँ। जब भी खाली रहता हूँ, शांत हो जाता हूँ बिलकुल। सोचनीय मुद्रा में। लोगों को लगता है असामाजिकता की ओर जा रहा हूँ, उदास हूँ, निराश हूँ, सबसे अलग एकांत रहने की इच्छा है मेरी। लेकिन मेरे मन में तो मेरे अतीत-वर्तमान-भविष्य के घटनाक्रमों में संग्राम छिड़ा होता है। उथल-पुथल मेरे सामाजिक व्यवहार को लेकर भी होती है। किसी की मज़ाक में कही छोटी बातें भी गहरी लग जाती हैं। किसी से कभी मज़ाक कर दिया तो एक चिंता और मन में बैठ जाती है कि उसे बुरा तो नहीं लगा होगा! 'सॉरी' तो हमेशा इसीलिए तैयार रखते हैं। वही एकमात्र इलाज भी तो है इस तनाव का।

अब देख लो! आज फिर कोस लिया खुद को! पता नहीं ऐसा केवल मेरे साथ है या फिर इस तरह के और भी पीस भगवान ने बनाये हैं। ज़िन्दगी है तो जीना है ही। चाहे रोकर जियें या फिर हंसकर। हंसकर ही जीने का मैं समर्थक हूँ। बचपन से हंसने का आदती भी हूँ। लेकिन आजकल वो आदत अपने आप न जाने कहाँ खो गयी है। शायद जीवन के उस नये अनुभव का असर है।

Saturday, 22 July 2017

साहित्यः कविता का सबसे संक्षिप्त रूप-विन्यास है हाइकू


 कविताओं के लिए ‘गागर में सागर’ की कहावत तो बहुत पुरानी है। बात चाहे कबीर के दो लाइन और चार चरण वाले दोहों की हो या फिर गालिब के दो मिसरों वाले किसी शेर की। ये वो चमत्कार है जो शब्दों की सबसे न्यून मात्रा में जीवन के सबसे गूढ़ रहस्यों का पूरा ग्रंथ अपने आप में समेटे हुए होता है। कविता लेखन की हाइकू विधा इसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण सोपान है। पांच-सात-पांच शब्दों के अनुशासन में बंधा तीन लाइन का यह विचित्र काव्य कम से कम शब्दों में विशद अर्थ देते हुए कविता लेखन के ‘गागर में सागर’ विशेषण को पुष्ट करता हुआ दिखाई देता है। हाइकू वर्तमान में संभवतः विश्व साहित्य की सबसे संक्षिप्त कविता है। सत्रहवीं शताब्दी के आस-पास जापान में के एक कवि मात्सुओ बाशो ने पहली बार जापानी साहित्य में हाइकू का शिल्प किया था। बाशो एक बौद्ध साधक थे। यही वजह रही कि हाइकू अपने पैदाइशी दौर में प्रकृति संबंधी विषयों के इर्द-गिर्द ज्यादा गढ़ी जाती रही। जापान में हाइकू ज्यादातर प्रकृति को चित्रित करती रही और यही हाइकू जब भारत में आती है तब अपनी प्रकृति कुछ यूं बदलती है कि गोपालदास नीरज से लेकर सत्यभूषण वर्मा तक जब हाइकू लिखते हैं तो उसे सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों पर व्यंग्य-बाण के धनुष की तरह इस्तेमाल करते हैं। जापान में भी व्यंग्य साहित्य उन्नत है। वहां व्यंग्य साहित्य ‘सेर्न्यू’ कही जाती है।
हाइकू के प्रवर्तक मात्सुओ बाशो


शब्द-विन्यास का यह सबसे संक्षिप्त रूप भारत में गुरूदेव रविंद्रनाथ टैगोर के प्रयासों से आया। अपनी जापान-यात्रा से लौटने के बाद गुरूदेव ने 1919 में जब ‘जापानी-यात्री’ लिखी तो उसमें हाइकू का जिक्र करते हुए इस विधा के प्रवर्तक बाशो के कुछ हाइकू का अनुवाद भी किया-

पुरोनो पुकुर
ब्यांगेर लाफ
जलेर शब्द

पचा डाल
एकटा को
शरत्काल।

सिर्फ गुरूदेव ने ही नहीं, हिंदी साहित्य के अनन्य साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय ने भी हाइकू को भारतीय साहित्य में स्थापित करने में अमूल्य योगदान दिया है। अपनी जापान-यात्रा में अज्ञेय ने कवि बाशो की हाइकू साधना का बड़ा गहरा अध्ययन किया। 1959 के आस-पास अज्ञेय जब भारत लौटे तब उनके ‘हे अमिताभ’, ‘सोन मछली’, ‘घाट-घाट का पानी’, ‘सागर में ऊब-डूब’ जैसी कालजयी कविताओं की गठरी में छंद का यह नया सांचा हाइकू भी मौजूद था। अज्ञेय ने भी बाशो की कविता का अनुवाद हिंदी मे किया था।

फुरु इके या (The Old Pond, Oh!) - तालपुराना
कावाजु तोबुकोमु (A frog jump In) – कूदा मेंढक
मिजुनो ओतू (The Water’s) – गुड़प्प..

हालांकि उपर्युक्त रचना अज्ञेय द्वारा बाशो की हाइकू का शाब्दिक अनुवाद भर है। इसमें हाइकू के अनुशासन का ख्याल नहीं रखा गया है। हिंदी साहित्य में हाइकू के प्रवेश के बाद कई साहित्यकारों ने इसके पैटर्न पर कविताएं लिखीं।

इकला चांद
असंख्यों तारे
नील गगन के
खुले किवाड़े
कोई हमको
कहीं पुकारे
हम आंएंगे
बांह पसारे।।

1964 के आस-पास लिखी गई केदारानाथ अग्रवाल की इस कविता में हाइकू की संक्षिप्तता का गुण स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। स्वयं अज्ञेय की कई कविताएं इसी तरह की हैं। साठ के दशक के बाद केदार नाथ अग्रवाल, श्रीकांत शर्मा, बच्चन, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, भवानी प्रसाद मिश्र और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जैसे कई साहित्यकारों ने अपनी कविताओं में नया प्रयोग करते हुए दो या तीन पंक्तियों की छोटी-छोटी कविताएं लिखी हैं। इस तरह के नवप्रयोगों की प्रेरणा हाइकू से ही मिलने का अनुमान लगाया जाता है।

इस तरह से नव-प्रयोगों की अपनी प्रवृत्ति और सहज भाव से सबको स्वीकारने की संस्कृति वाले हिंदी साहित्य के कोश में इस विधा का पदार्पण हुआ। ‘अरथ अमित अति आखर थोरे’ का प्रायोगिक प्रतिमान स्थापित करने वाली हाइकू आज अपनी संक्षिप्तता की वजह से सर्वाधिक तेजी से अपनाई जाने वाली विधा बनती जा रही है। हाइकू में सत्रह वर्ण होते हैं। ये सत्रह वर्ण तीन पंक्तियों में इस तरह विभाजित होते हैं कि पहली और तीसरी पंक्ति में पांच-पांच वर्ण हों जबकि दूसरी पंक्ति में सात वर्ण। जैसे-
जन्म मरण
समय की गति के
हैं दो चरण

वो है अपने
देखें हो मैने जैसे
झूठे सपने

--गोपाल दास नीरज

इसी तरह की कई हाइकू कविताएं आधुनिक हिंदी साहित्य में तेजी से अपना स्थान बनाती जा रही हैं। इसका संक्षिप्त होना ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है जो नए कवियों को अपनी ओर आकर्षित करती है। हाइकू लिखने से पहले इसका पूरा विज्ञान समझना भी जरूरी है, क्योंकि तभी इसके अर्थों का वजन बरकरार रहेगा। आज के दौर में ऐसे कवियों की कोई कमी नहीं है जिनके लिए हाइकू सिर्फ पाच-सात-पांच वर्णों का संयोजन मात्र है, इसके अलावा कुछ भी नहीं। ऐसे लोग धड़ाधड़ हाइकू की पुस्तकें छपवाकर सिर्फ कूड़ेदानों का बोझ बढ़ा रहे हैं। हाइकू के लिए गंभीर चिंतन और एकाग्रता की आवश्यकता होती है। जीवन अनुभूतियों को शब्दों में ढालकर उकेरने के लिए पर्याप्त धैर्य चाहिए होता है। तब जाकर कहीं सच्चे अर्थों में हाइकू अपने लक्ष्यों तक पहुंचता है।


कला-खेल-साहित्य सीमाओं के बंधनों को नहीं मानते। हाइकू इस तथ्य का सबसे सटीक उदाहरण है। सोलहवीं शताब्दी में जापान में पैदा हुए साहित्य के इस सबसे लघु स्वरूप ने दुनिया के कई देशों की सीमाएं पारकर वहां के साहित्य में अपना स्थान बनाया है। हिंदी में इसका स्थान साल दर साल और दृढ़ और महत्वपूर्ण होता ही जा रहा है। यूरोप में अंग्रेजी के इतर लगभग सभी भाषाओं में हाइकू काफी उत्साह से लिखे जा रहे हैं। वैश्विक एकात्म्य की स्थापना में साहित्य के योगदान की सार्थकता सिद्ध करने का दायित्व हाइकू ने अपने कंधे पर ले लिया है और वह अपने इस काम में निरंतर सफल भी हो रहा है। यह ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के मंत्र की साकार्यता के लिए शुभ संकेत है।

Friday, 23 June 2017

उसे न कहना पड़े कि उसका जीवन एक भयानक दुर्घटना है

पिछले कुछ सालों में देश में दलित-विमर्श कुछ एक अप्रिय घटनाओं का दामन थामें देश की मीडिया की दहलीज तक पहुंचा था और अब तो यह राष्ट्रीय बहस का प्रमुख केंद्र इसलिए बन गया है क्योंकि गणतंत्र के सबसे बड़े सिंहासन के लिए होने वाली लड़ाई में आमने-सामने की सेना का नायक इसी समुदाय से सम्बन्ध रखता है। राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए की ओर से भाजपा अध्यक्ष के रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा 'दलित उम्मीदवार' को रेखांकित करते हुए करने के बाद विपक्ष खेमे में माकूल जवाब देने को लेकर मची हलचल ने जो परिणाम दिया है, उसने इस लड़ाई को पूर्व निश्चित परिणाम को प्रभावित किये बिना भी रोचक बना दिया है। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार यूपीए समर्थित राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हैं। बिहार से हैं और दलित भी हैं। मीरा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और देश के उप प्रधानमंत्री रहे बाबू जगजीवन राम की बेटी हैं और बिहार के सासाराम से दो बार सांसद भी रह चुकी हैं। सत्ता पक्ष से डैमेज कंट्रोल के तहत उतारे गये उम्मीदवार रामनाथ कोविंद से मुकाबले के लिए उन्हें मैदान में उतारा गया है। 'दलित उत्थान' और 'दलित समर्थक' होने का राष्ट्रव्यापी सन्देश-शंखनाद करने वाले सत्ता पक्ष का दलितों को लेकर क्या रवैया अब तक रहा है, राष्ट्र को इस पर भी थोड़ा बहुत गौर अवश्य करना चाहिए।

आंध्र प्रदेश के हैदराबाद विश्वविद्यालय में कुछ मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे 5 छात्रों का एबीवीपी के छात्रों से हाथापाई होने के बाद केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने इस घटना के बाबत तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी को पत्र लिखकर इस मामले पर कार्रवाई करने का निवेदन किया जिसके बाद विश्वविद्यालय के वाईस चांसलर ने 5 छात्रों को हॉस्टल से ससपेंड कर दिया और उनकी फ़ेलोशिप भी बन्द कर दी। इसके विरोध में पांचों छात्रों ने विश्वविद्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। घटना राष्ट्रीय स्तर पर सुर्ख़ियों में तब आई जब उन पांच छात्रों में से एक छात्र रोहित वेमुला ने एक खत लिखकर आत्महत्या कर ली। वेमुला दलित समुदाय से ताल्लुक रखते थे जिसके कारण विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकर को घेरने की भरपूर कोशिश की।

कुछ दिनों बाद प्रधानमंत्री के मॉडल स्टेट गुजरात के ऊना से एक हैरान कर देने वाली घटना की खबर आयी। इस घटना का जो वीडियो सामने आया था वो काफी भयानक था। मृत गाय के चमड़े उतारने को लेकर कुछ तथाकथित गौरक्षकों के दलित समुदाय के कुछ लोगों को बड़ी बेरहमी से पीटते हुए दृश्यों वाली इस वीडियो ने सरकारी 'दलित प्रेम' के आडम्बर की पोल खोलकर रख दी। गोरक्षा के नाम पर दलितों के साथ हुए इस अत्याचार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करते हुए कई लोगों ने आत्महत्या तक करने की कोशिश की थी ताकि सरकार के बाहर कानों तक अपनी पीड़ा पहुंचा सकें। इस घटना के बाद सरकार निशाने पर तो आई, लेकिन विपक्ष का निशाना हर बार की तरह इस बार भी चूक गया। प्रधानमंत्री ने अलबत्ता एक सभा में बोलते हुए गर्जना की थी कि मेरे दलित भाइयों को मारना बन्द करो, और अगर वार करना ही है तो मुझ पर वार करो। हालाँकि उनकी इस बात को उनके समर्थकों ने इतनी गम्भीरता से नहीं लिया।

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में बाबा साहेब आंबेडकर की मूर्ती को लगाने को लेकर हुए विवाद में कई दलित प्रदर्शनकारियों पर गम्भीर धाराओं में मुकदमें दायर किये गए। जिसके विरोध में भीम सेना नाम के संगठन के लोग अपने नेता चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में दिल्ली के जंतर मंतर पर लामबंद हुए। आज़ाद बाद में गिरफ्तार कर लिए गए। दलितों की तथाकथित महाहितैषी सरकार ने मामले को गम्भीरता से लेने की ज़रूरत नहीं समझी। अखबारों और न्यूज़ वेबसाइटों ने ऐसे कई मसले छोटे छोटे कॉलमों के माध्यम से प्रकाशित किया लेकिन इन मसलों में दलितों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ काम करना भारतीय राजनीति में दलित प्रेम, दलित उत्थान, दलित समर्थन की परिभाषाओं में नहीं आता। दलितों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाने के लिए सरकार को किसी दलित नेता को ढूंढना पड़ता है जिसे वो राष्ट्रपति बनाकर उन सभी लोगों का मुंह बंद कर सके जो उपर्युक्त घटना को लेकर सरकार को घेरने की फ़िराक़ में हों।

विपक्ष ने इस मामले में हालाँकि बहुत देर कर दी। मोदी सरकार के आने के बाद विपक्ष जितना लाचार हो गया है शायद ही भारतीय राजनीति में आज से पहले गैर-सत्तापक्ष कभी इतना बेचारा रहा हो। कांग्रेस विपक्ष का अगुआ होकर एकजुटता की पहल कर सकती थी और सत्ता के खिलाफ एक ऐसा सर्वमान्य उम्मीदवार उतारकर विपक्ष की शक्ति का आभास सरकार को करवा सकती थी लेकिन वो ऐसा कर पाने में हर बार की तरह असफल रही और इस दीवार में फिर से सेंध लग गयी। हर बार ऐसा देखने को मिलता है कि विपक्षी पार्टियां जब भी एक छत के नीचे आने का प्रयास करती हैं किसी न किसी राजनेता का राजनीतिक स्वाभिमान या फिर उसकी राजनैतिक महत्वकांक्षा पूरे मंसूबे को तहस-नहस कर देती है। इस बार भी वही हुआ। जो नितीश कुमार विपक्ष को एकजुट करने के सबसे ज्यादा योग्य माने जा रहे थे उन्होंने सबसे पहले पाला बदल लिया और तभी जब विपक्ष ने अपना उम्मीदवार तक नहीं उतारा था, उनहोंने एनडीए उम्मीदवार कोविंद के समर्थन की घोषणा कर दी। काफी दिन सोचने के बाद कांग्रेस ने पूर्व लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार को कोविंद के खिलाफ उतरने का फैसला किया। एक योग्य उम्मीदवार होने के बावजूद भी उनकी हार तो लगभग तय है, लेकिन उनकी उम्मीदवारी ने राजनैतिक खेमे के कई बयानवीरों को शायद असमंजस में डाल दिया है। विपक्षी हलकों में कुछ समय तक भारत में हरित क्रांति के नायक एमएस स्वामीनाथन को उम्मीदवार बनाये जाने को लेकर अटकलें थीं जो शायद सरकार के उम्मीदवार के लिए बेहतर चुनौती के रूप में उभरकर आते। सत्ता पक्ष के दलित कार्ड के मुकाबले में किसानी से सम्बंधित व्यक्ति को उम्मीदवार बनाने से विपक्ष को कम से कम मनोवैज्ञानिक बढ़त तो मिल ही जाती।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कोविंद का नाम प्रस्तावित करते हुए दलित हितैषी होने के दम्भ से भरे जा रहे थे और अपने चयन पर इतराते हुए उनकी पार्टी की सरकार के कार्यकाल में दलित उत्पीड़न के मामले को नज़रअंदाज़ करने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी। कोविंद के दलित होने के कारण विपक्ष खुलकर इसका विरोध करने से भी डर रहा था कि कहीं तीन साल से 'गद्दार' 'राष्ट्रद्रोही' की उपाधि पाते पाते कहीं दलित विरोधी होने का तमगा भी न मिल जाए। केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के उस बयान को याद करिये जिसमें उन्होंने कहा था कि जो कोई भी कोविंद का समर्थन नहीं करता वो दलित विरोधी है। मैं इंतज़ार कर रहा हूँ कि कोई रिपोर्टर पासवान जी से पूछे कि अब आप क्या करेंगे? कोविंद को वोट देकर महिला कम दलित विरोधी होना मंजूर करेंगे या फिर कोविंद के खिलाफ वोट देकर सरकार विरोधी होना। यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए ताकि अगली बार जब ये लोग इस तरह के बयान दें और राष्ट्रपति पद की योग्यता के पावन प्रावधानों में जातिवाद की मिलावट करें तो उन्हें ये सवाल याद आ जाएं।

राजनीति अब प्रतीकों का इस्तेमाल कर अपने काले कारनामें सफ़ेद करने का मंत्र जान चुकी है। उसके लिए गाँव के दक्खिन में बसने वाले रामधारी हरिजन की समस्याओं का समाधान, ऊना में गाय की खाल उतारने को लेकर पीटेे गये रमेश की पीठ पर कोड़ों की चोट का मरहम, हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला के जीवन की कीमत महज किसी दलित को राष्ट्रपति बना भर देने से मिल जाता है। इसी से वो दलितों की हितैषी बन जाती है। इन सारे मसलों पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश उर्मिल की यह टिप्पणी गौर करने लायक है जिसमें वो कहते हैं, "वो हर चुनाव मे जाति-धर्म का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करेंगे पर जातिवादी नहीं कहलाएंगे। हर चुनाव में सबसे ज्यादा पैसा खर्चेगे पर इस धरती के सबसे ईमानदार माने जायेंगे।  क्योंकि उनके पास कारपोरेट है, मीडिया है, सारा विधि-विधान है, तमाम एजेंसियां हैं, ब्रह्म और बाबा हैं! क्या है, जो उनके पास नहीं है!" खैर, सरकार के लिए भले ही किसी दलित को राष्ट्रपति बना देना दलित उत्थान का मापदंड हो लेकिन यह देश दलितों के उस दौर का मुन्तज़िर है जब किसी रोहित वेमुला को अपना आखिरी पत्र न लिखना पड़े जिसमें उसे कहना पड़े कि उसका जीवन एक भयानक दुर्घटना है।

Sunday, 18 June 2017

खेल को खेल रहने दीजिए

खेल-कला-साहित्य-सिनेमा, आधुनिक विश्व की ये संस्कृतियां वैश्विक एकात्म्य की आखिरी उम्मीद हैं। खेल भावना पर सीमाजनित राष्ट्रवाद थोपकर इस आशा की हत्या का प्रयास सफल होने देना है या नहीं, यह हमें और आपको सोचना है।

भारत-पाकिस्तान से जब भी क्रिकेट मैच की बारी आती है, पूरा देश एक विचित्र प्रतिद्वंदिता में लग जाता है जिसमें नफरत की गंध साफ़ महसूस की जा सकती है। न्यूज़ स्टूडियोज़ जंग के मैदान बन जाते हैं। बुलेटिन के नाम डराने लगते हैं। एंकर की भाषा यूं होती है कि उसे इस त्रिभुजाकार देश की सीमाओं से बाहर ही नहीं जाने देना चाहिए। जनभावना अनावश्यक रूप से कुछ लोगों के बयान और उनकी भाषाओं को एक तीखापन दे जाती हैं। तनाव, आशंका और डर सारे देश को अपने पंजे में जकड़ लेता है, और फिर यहीं मर जाती है, खेल की मूल भावना, खेल का मुख्य उद्देश्य, खेल की मूल प्रकृति।

अपने देश से हर कोई मोहब्बत करता है। मोहब्बत कभी अलगाव का कारण नहीं बनती। अगर ऐसा होता है तो वो मोहब्बत नहीं, वो जबर्दस्ती का एक नाटक है, जो दिल से नहीं दिमाग से उपजता है। मैदान पर जब अलग अलग रंगों की जर्सी पहने अलग अलग देश की टीमें उतरती हैं तो वो दो देश नहीं होतीं, वो सिर्फ दो टीमें होती हैं। हर कोई अच्छी चीजों को पसंद करने का आदी होता है। जो भी टीम अच्छा खेले उसका समर्थन, उससे मोहब्बत करना, यही तो खेल-संस्कृति है। खेल कोई जंग नहीं है। यह उन कुछ उन्मादी लोगों की कुंठा की वजह से युद्धजन्य तनाव और भय के वातावरण में बदल जाती है जिन्हें इसे भुनाकर अपनी दुकान चलानी होती है।

इसलिए बचकर रहिएगा। खेल कोई भी हो, जीतेगा वही, जो अच्छा खेलेगा। कौन किसका बाप है, कौन किसका नाती, ये चीजें खेल का परिणाम निर्धारित नहीं करतीं। इंडियन क्रिकेट टीम के आधे से अधिक खिलाडियों की प्रदर्शन दर दुनिया भर के क्रिकेट खिलाड़ियों में सबसे बेहतर थीं, लेकिन आज पाकिस्तानी खिलाडियों के समर्पित और कसे हुए प्रदर्शन के आगे सभी बेकार साबित हुए। इसमें भारतीय टीम की कोई गलती नहीं कि वो गालियाँ सुनें। खेल है, बाज़ी कभी भी पलट सकती है। कोई भी अजेय तो नहीं है। जिसने अच्छा खेला, उसकी प्रसंशा के बीच अहंकार या नफरत तो नहीं ही आनी चाहिए।

बैट या फिर हॉकी पकड़ने वाले ख़िलाड़ी गर्दन नहीं काटते। वो बस खेलना जानते हैं। जो खिलाडी होते हैं उन्हें हार-जीत से खास फर्क नहीं पड़ता क्योंकि खेल-प्रशिक्षण की प्रक्रिया में हार को स्वीकार कर उससे सीखने का एक महत्वपूर्ण अध्याय होता है। इसलिए हार न तो प्रतिष्ठा पर प्रहार है और न ही जीत सदैव सम्राट रहने का चिर आश्वासन है। अनिश्चितताएं एक रोमांचक खेल की महत्वपूर्ण आवश्यकता हैं। मायने रखने वाली बात ये है कि किसी हार से आप कुछ सीखते हैं या फिर टूटते हैं।

ऐसे दौर में जब धार्मिकता का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो चुका हो, सामाजिकता का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो चुका हो तब खेल को राजनैतिक कुचक्र से बचकर रखना न सिर्फ खिलाडियों के लिए बल्कि खेलप्रेमियों के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। हर चीज़ अपने नियत स्थान पर ही अच्छी लगतीं हैं। खेल को खेल रहने दीजिए। उसमें राजनीति मिलाकर उसका स्वरुप मत बिगाड़िये। नफरत जितनी हो सके कम करना है, मोहब्बत जितना हो सके बढ़ाना है। मोहब्बत बढ़ाने का जतन करिए, नफरत के परिणाम तो हमने कई बार देखे और भुगते हैं ही।